आज निर्मल वर्मा का जन्मदिन है |
वह आज यदि जिन्दा होते तो 82 वर्ष के होते |
एक लेखक और विचारक के रूप में निर्मल वर्मा मुझे इसलिए प्रभावित करते रहे हैं कि उन्होंने इतिहासबोध और आधुनिकता को खासी जिद और मुखरता के साथ एक-दूसरे का पर्याय माना | उन्होंने भारतीय सभ्यता को नर्मदा की धारा की तरह माना/पहचाना और कहा कि यही कारण है कि हमारे यहाँ 'मैं' और 'अन्य' की समस्या नहीं है और हमारे लिए कोई पराया नहीं है | एक विचारक के रूप में निर्मल वर्मा के लिए परंपरा कोई अतीत की वस्तु नहीं है, वह सदैव एक जीवंत धड़कन की तरह हमारे भीतर रहती है और इसलिए वह निरंतर वर्तमान है - वह अपनी तात्कालिकता में शाश्वत है | परंपरा कोई अवधारणा नहीं - एक अनुभूति, एक बोध है जिसके आधार पर हमें समय और इतिहास को समझना चाहिए | सवाल उठता है कि यह परंपरा किस तरह की अनुभूति है ? निर्मल वर्मा के लिए भारतीय परंपरा का अर्थ 'संलग्नता का सर्वव्यापी बोध' है - अपने को समग्र के एक अंश के रूप में अनुभव करना - समग्र जो देश में भी व्याप्त है और काल में भी, जो प्रकृति भी है और मनुष्य भी और जिस में मनुष्य प्रकृति से उसी तरह जुड़ा है जैसे भूगोल, पेड़-पौधे या पशु-पक्षी | 'संलग्नता का यह सर्वव्यापी बोध' भारतीय चित्त का मुख्य कारक है जिसे निर्मल वर्मा 'संस्कृति का स्वप्न' कहते थे |
निर्मल वर्मा के कथा-पुरुष के साथ अपने वर्षों के संबंध के बावजूद मैं जब भी उसका सामना करता हूँ, हर बार मुझे एक विचित्र-सी अनुभूति होती है | वह बिल्कुल वैसी ही अनुभूति है, जैसी निर्मल वर्मा के ही एक पात्र को अपने बड़े भाई को देख कर होती है | उनकी 'कव्वे और काला पानी' शीर्षक कहानी में छोटा भाई अपने बड़े भाई को देख कर सोचता है :
'.....वे सन्यासी और भाई के बीच कोई पहचाने से अजनबी जान पड़ते थे |'
थोड़ी ही गहराई में जाने पर हम पाते हैं कि मेरी अनुभूति के सादृश्य के लिए यह कोई अकेला संदर्भ नहीं है, बल्कि यह निर्मल वर्मा के तमाम पात्रों के आपसी संबंधों का ही विरोधाभास है | वे हमेशा अपनी पहचान को हल्का-सा प्रतिरोध देते हैं और न तो दूसरे को उसका 'आदी' होने देते हैं और न ही खुद उसके 'आदी' होते हैं; साथ ही वे अपनी अजनबीयत को भी इतना गहरा कभी नहीं होने देते कि आप उन्हें न पहचानने का बहाना कर सकें .... | यह विरोधाभास तब और भी चौंकाने वाला लग सकता है यदि हम एक दूसरी 'कहानी' की तरफ ध्यान दें | इस कहानी में निर्मल वर्मा खुद एक पात्र हैं और अपनी उपर्युक्त कहानी के छोटे की ही भाँति अपने एक अग्रज की ओर मुड़कर देख रहे हैं, ये अग्रज अज्ञेय हैं :
'यदि यह एक विरोधाभास न जान पड़े तो मैं इसे एक 'आत्मीय दूरी' कहना चाहूँगा, जिसमें सान्निध्य का स्नेह था तो दूरी की निस्संगता भी ....|'
यह विरोधाभास निर्मल वर्मा के संबधों में (हालाँकि तब इन्हें 'संबंध' भी कैसे कहा जा सकता है !) इतना प्रबल है कि उनके पात्रों के साथ अपने संबंध के सिलसिले में जब हम खुद इसे अनुभव करते हैं तो संशय होता है कि कहीं हमारी यह अनुभूति उस विरोधाभास की छूत का नतीजा तो नहीं है, कहीं ऐसा तो नहीं कि हम खुद भी इस विरोधाभास द्वारा आभ्यन्त्रीकृत कर लिए गए हों, और तब क्या हम इस विरोधाभास को समझ पाने की स्थिति में भी रह गए होंगे ...|
जो भी हो, हम इस दुविधा को और अधिक हवा न देते हुए, इस विरोधाभास पर ध्यान केन्द्रित करते हैं जो अपने आप में इतना मूलगामी और, अगर संक्रामक नहीं तो, इतना सर्वमान्य है कि एक साथ लेखक, उसके पात्रों और उसके पाठकों के आरपार व्याप्त है - हर संबंध की शर्त के रूप में, मानों वह संबंध के होने का ही ढंग हो | और यदि ऐसा है तो दो इकाइयों के बीच का होने से पहले उसे एक ही इकाई के आंतरिक संघटन का ही विरोधाभास होना चाहिए | व्यक्ति का अपना विरोधाभास, जिसमें वह 'स्वयं' को एक 'पहचाने हुए अजनबी' की तरह अनुभव करता है, जिसमें वह 'अपने ही साथ' एक आत्मीय दूरी पर है |
यहाँ 'व्यक्ति का विरोधाभास' कहने में इस बात पर विशेष बल है कि यह व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में ही प्रभावित करने के अर्थ में एक विरोधाभास है, यानी ऐसी स्थिति जिसमें व्यक्ति के रूप में ही उसकी पहचान दाँव पर है : वह एक ही साथ व्यक्ति है भी और नहीं भी है |
'सृजन में सौंदर्य और नैतिकता' पर विचार करते हुए निर्मल वर्मा ने क़रीब पैंतीस वर्ष अपने कथा-लेखन की प्रक्रिया के बारे में जो कहा था, वह आज भी हमारे लिए पूरी तौर पर कारगर है | उन्होंने लिखा था : ....महत्वपूर्ण मेरे लिए अनुभव नहीं, स्मृति का वह झरोखा है जिसमें से गुज़रकर वे कहानियाँ बनते हैं | हर रचना एक तरह से सिंहावलोकन है | 'हवा' में उड़ते, आसपास मँडराते अनुभव-खण्डों में किसको पकड़ पाता हूँ, किसको जानबूझ कर छोड़ देता हूँ, किसको सहसा गुज़र जाने देता हूँ, यह महज़ संयोग पर निर्भर नहीं करता; न वह मेरी कलात्मक दक्षता या चालाक पकड़ पर निर्भर करता है; बल्कि जब तक उन अनुभव-खण्डों को मेरे भीतर का जादू-मंत्र, शून्य पर गड़े स्मृति-संकेत पास नहीं बुलाते, मैं उनका कोई फायदा नहीं उठा सकता | उनकी कभी कोई कहानी नहीं बनती |
निर्मल वर्मा अपनी रचनाओं में उस जीवन की सच्चाई को थामते हैं जो संसार में होते हुए भी सांसारिक नहीं है, यथार्थ में होते हुए भी उन मानकों के बाहर है जिनमें यथार्थ को परिभाषित, संस्थापित किया जाता है |
निर्मल वर्मा के जन्मदिन के मौके पर इन सब बातों को याद करने, रेखांकित करने में समय से मुठभेड़ करने जैसी चुनौती मुझे महसूस हुई |
निर्मल वर्मा को, उनकी स्मृति को आदर के साथ नमन !
वह आज यदि जिन्दा होते तो 82 वर्ष के होते |
एक लेखक और विचारक के रूप में निर्मल वर्मा मुझे इसलिए प्रभावित करते रहे हैं कि उन्होंने इतिहासबोध और आधुनिकता को खासी जिद और मुखरता के साथ एक-दूसरे का पर्याय माना | उन्होंने भारतीय सभ्यता को नर्मदा की धारा की तरह माना/पहचाना और कहा कि यही कारण है कि हमारे यहाँ 'मैं' और 'अन्य' की समस्या नहीं है और हमारे लिए कोई पराया नहीं है | एक विचारक के रूप में निर्मल वर्मा के लिए परंपरा कोई अतीत की वस्तु नहीं है, वह सदैव एक जीवंत धड़कन की तरह हमारे भीतर रहती है और इसलिए वह निरंतर वर्तमान है - वह अपनी तात्कालिकता में शाश्वत है | परंपरा कोई अवधारणा नहीं - एक अनुभूति, एक बोध है जिसके आधार पर हमें समय और इतिहास को समझना चाहिए | सवाल उठता है कि यह परंपरा किस तरह की अनुभूति है ? निर्मल वर्मा के लिए भारतीय परंपरा का अर्थ 'संलग्नता का सर्वव्यापी बोध' है - अपने को समग्र के एक अंश के रूप में अनुभव करना - समग्र जो देश में भी व्याप्त है और काल में भी, जो प्रकृति भी है और मनुष्य भी और जिस में मनुष्य प्रकृति से उसी तरह जुड़ा है जैसे भूगोल, पेड़-पौधे या पशु-पक्षी | 'संलग्नता का यह सर्वव्यापी बोध' भारतीय चित्त का मुख्य कारक है जिसे निर्मल वर्मा 'संस्कृति का स्वप्न' कहते थे |
निर्मल वर्मा के कथा-पुरुष के साथ अपने वर्षों के संबंध के बावजूद मैं जब भी उसका सामना करता हूँ, हर बार मुझे एक विचित्र-सी अनुभूति होती है | वह बिल्कुल वैसी ही अनुभूति है, जैसी निर्मल वर्मा के ही एक पात्र को अपने बड़े भाई को देख कर होती है | उनकी 'कव्वे और काला पानी' शीर्षक कहानी में छोटा भाई अपने बड़े भाई को देख कर सोचता है :
'.....वे सन्यासी और भाई के बीच कोई पहचाने से अजनबी जान पड़ते थे |'
थोड़ी ही गहराई में जाने पर हम पाते हैं कि मेरी अनुभूति के सादृश्य के लिए यह कोई अकेला संदर्भ नहीं है, बल्कि यह निर्मल वर्मा के तमाम पात्रों के आपसी संबंधों का ही विरोधाभास है | वे हमेशा अपनी पहचान को हल्का-सा प्रतिरोध देते हैं और न तो दूसरे को उसका 'आदी' होने देते हैं और न ही खुद उसके 'आदी' होते हैं; साथ ही वे अपनी अजनबीयत को भी इतना गहरा कभी नहीं होने देते कि आप उन्हें न पहचानने का बहाना कर सकें .... | यह विरोधाभास तब और भी चौंकाने वाला लग सकता है यदि हम एक दूसरी 'कहानी' की तरफ ध्यान दें | इस कहानी में निर्मल वर्मा खुद एक पात्र हैं और अपनी उपर्युक्त कहानी के छोटे की ही भाँति अपने एक अग्रज की ओर मुड़कर देख रहे हैं, ये अग्रज अज्ञेय हैं :
'यदि यह एक विरोधाभास न जान पड़े तो मैं इसे एक 'आत्मीय दूरी' कहना चाहूँगा, जिसमें सान्निध्य का स्नेह था तो दूरी की निस्संगता भी ....|'
यह विरोधाभास निर्मल वर्मा के संबधों में (हालाँकि तब इन्हें 'संबंध' भी कैसे कहा जा सकता है !) इतना प्रबल है कि उनके पात्रों के साथ अपने संबंध के सिलसिले में जब हम खुद इसे अनुभव करते हैं तो संशय होता है कि कहीं हमारी यह अनुभूति उस विरोधाभास की छूत का नतीजा तो नहीं है, कहीं ऐसा तो नहीं कि हम खुद भी इस विरोधाभास द्वारा आभ्यन्त्रीकृत कर लिए गए हों, और तब क्या हम इस विरोधाभास को समझ पाने की स्थिति में भी रह गए होंगे ...|
जो भी हो, हम इस दुविधा को और अधिक हवा न देते हुए, इस विरोधाभास पर ध्यान केन्द्रित करते हैं जो अपने आप में इतना मूलगामी और, अगर संक्रामक नहीं तो, इतना सर्वमान्य है कि एक साथ लेखक, उसके पात्रों और उसके पाठकों के आरपार व्याप्त है - हर संबंध की शर्त के रूप में, मानों वह संबंध के होने का ही ढंग हो | और यदि ऐसा है तो दो इकाइयों के बीच का होने से पहले उसे एक ही इकाई के आंतरिक संघटन का ही विरोधाभास होना चाहिए | व्यक्ति का अपना विरोधाभास, जिसमें वह 'स्वयं' को एक 'पहचाने हुए अजनबी' की तरह अनुभव करता है, जिसमें वह 'अपने ही साथ' एक आत्मीय दूरी पर है |
यहाँ 'व्यक्ति का विरोधाभास' कहने में इस बात पर विशेष बल है कि यह व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में ही प्रभावित करने के अर्थ में एक विरोधाभास है, यानी ऐसी स्थिति जिसमें व्यक्ति के रूप में ही उसकी पहचान दाँव पर है : वह एक ही साथ व्यक्ति है भी और नहीं भी है |
'सृजन में सौंदर्य और नैतिकता' पर विचार करते हुए निर्मल वर्मा ने क़रीब पैंतीस वर्ष अपने कथा-लेखन की प्रक्रिया के बारे में जो कहा था, वह आज भी हमारे लिए पूरी तौर पर कारगर है | उन्होंने लिखा था : ....महत्वपूर्ण मेरे लिए अनुभव नहीं, स्मृति का वह झरोखा है जिसमें से गुज़रकर वे कहानियाँ बनते हैं | हर रचना एक तरह से सिंहावलोकन है | 'हवा' में उड़ते, आसपास मँडराते अनुभव-खण्डों में किसको पकड़ पाता हूँ, किसको जानबूझ कर छोड़ देता हूँ, किसको सहसा गुज़र जाने देता हूँ, यह महज़ संयोग पर निर्भर नहीं करता; न वह मेरी कलात्मक दक्षता या चालाक पकड़ पर निर्भर करता है; बल्कि जब तक उन अनुभव-खण्डों को मेरे भीतर का जादू-मंत्र, शून्य पर गड़े स्मृति-संकेत पास नहीं बुलाते, मैं उनका कोई फायदा नहीं उठा सकता | उनकी कभी कोई कहानी नहीं बनती |
निर्मल वर्मा अपनी रचनाओं में उस जीवन की सच्चाई को थामते हैं जो संसार में होते हुए भी सांसारिक नहीं है, यथार्थ में होते हुए भी उन मानकों के बाहर है जिनमें यथार्थ को परिभाषित, संस्थापित किया जाता है |
निर्मल वर्मा के जन्मदिन के मौके पर इन सब बातों को याद करने, रेखांकित करने में समय से मुठभेड़ करने जैसी चुनौती मुझे महसूस हुई |
निर्मल वर्मा को, उनकी स्मृति को आदर के साथ नमन !
