सामाजिक जीवन में परंपराएँ महत्त्वपूर्ण होती हैं | उनकी जड़ें इतिहास की गहराइयों में होती हैं और अनेक स्थितियों में उनकी अवहेलना भी नहीं की जा सकती, किंतु अपनी ऐतिहासिकता के कारण ही परंपराएँ पूजनीय नहीं बन जाती हैं | सम-सामयिक संदर्भों में उनके विशिष्ट प्रकार्य ही उनका महत्त्व और मूल्य निर्धारित करते हैं | समाज के बदलते परिवेश और प्रतिमानों से जिन परंपराओं का सामंजस्य नहीं होता, वह क्रमशः शक्तिहीन होती जाती हैं | उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयत्न सांस्कृतिक विसंगतियों को जन्म देते हैं | समाज जब अपने विकास के नए लक्ष्य और नई दिशाएँ निर्धारित कर उनकी प्राप्ति के लिए नियोजित प्रयास करता है तो अनेक परंपराओं में परिवर्तन करना उसके लिए अनिवार्य हो जाता है | इतिहास के आकर्षण और आधुनिकीकरण की अनिवार्यता के ध्रुवांतों के बीच अनेक समाज दिग्भ्रमित होकर अपने-आपको अनिश्चय की असहाय स्थिति में पाते हैं | परंपरा की ओर उन्मुख अभिजात वर्ग उनके इस अनिश्चय का उपयोग अपने न्यस्त स्वार्थों की साधना में करता है | एक सीमा तक यह प्रयत्न सफल भी होते हैं, किंतु अंततः वे नई इच्छाओं के विस्फोट को रोकने में समर्थ नहीं होते |
आकांक्षाओं के उभरते क्षितिज जब अपने-आपको परंपराओं से अवरूद्ध पाते हैं, तब वह एक ऐसे आक्रोश के रूप में प्रकट होते हैं, जो अनेक उपयोगी और प्रकार्य-युक्त परंपराओं को भी ध्वस्त कर देते हैं | इतिहास संस्कृति को गरिमा प्रदान कर सकता है, किंतु संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसकी अनुकूलन क्षमता में निहित होती है | सम-सामयिक विश्व की चुनौतियों और बदलते परिवेश से संबद्ध समस्याओं का समाधान वह किस प्रकार करती है, इसी पर उसका भवितव्य निर्भर होता है | नए आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों द्धारा जनित सभी समस्याओं का निदान और उपचार इतिहास के पृष्ठों में मिल सकता है | विराट उपलब्धियों वाली अनेक महान संस्कृतियाँ इसीलिए क्षीण या विनष्ट हो गईं कि वह अपनी गौरवपूर्ण किंतु अप्रकार्यवादी परंपराओं से अपने-आपको मुक्त कर नयी समस्याओं के नए समाधान न खोज सकीं | मिस्र और सुमेर, एजटेक और इंका, यूनान और रोम की सभ्यताओं का ह्यास इसी कारण से हुआ |
यही हाल हमारी प्राचीन सभ्यताओं व संस्कृतियों का है | निस्संदेह हमारी प्राचीन सभ्यता की अनेक उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं | उन पर संपूर्ण मानवजाति और विशेषकर हम भारतीयों को गर्व होना ही चाहिए | परंतु इस गर्व से ही हमारे समाज के गंभीर प्रश्न हल नहीं हो सकते | जिन विशिष्ट स्थितियों ने प्राचीन भारत में विचारात्मक और कलात्मक सर्जना को प्रेरित किया था वह सम-सामयिक भारत में नहीं हैं | नए प्रतिमानों और मूल्यों ने उन्हें पहले अनुपयुक्त बना दिया और फिर अपदस्त कर दिया | आज के समाज में न केवल समस्याओं के आयाम बदले हैं, बल्कि उन पर विचार करने का ढंग भी बदल गया है | जाति-व्यवस्था किसी समय सावयवी सामाजिक संगठन का सुंदर उदाहरण रही होगी, किंतु आज के नए मानवीय मूल्यों को उसमें अंतर्निहित जन्म-जात उच्चता और हीनता की भावना स्वीकार नहीं है | कर्म और नियति के सिद्धांतों का एक उद्धात्त दार्शनिक पक्ष है, किंतु व्यावहारिक रूप में निष्क्रियता और अकर्मण्यता को पुरस्कृत करने के कारण वह आज की स्थिति में प्रगति-अवरोधक प्रमाणित होते हैं |
भारतीय सभ्यता का जो आदर्श चित्र हमारे सम्मुख है वह किसी एक युग के यथार्थ पर आधारित नहीं है | उसमें विभिन्न युगों के विभिन्न तत्त्वों का संकलन है - जो सतत प्रक्रिया के तहत संकलित हुए हैं | ऐतिहासिक संदर्भों में जिन प्रवृत्तियों का कुछ अर्थ था, नए संदर्भों में वह अर्थहीन हो गई हैं | आधुनिक मनुष्य वर्तमान में जीता है और भविष्य को नियोजित करता है | बार-बार पीछे देखने का रोग उसे आगे बढ़ने से रोकता है | गौरवमयी इतिहास का नशा उसे क्षणिक और नकली संतोष दे सकता है, पर उसकी समस्याओं को हल नहीं कर सकता | मानवीय विवेक और तर्क-संगतता की कसौटी पर जो परंपराएँ और रूढ़ियाँ अनुपयोगी हों उनसे छुटकारा पा लेने में ही सभी की भलाई है | मनुष्य ऐतिहासिक परंपराओं के अनुकरण के लिए नहीं जीता, वह जीकर ऐतिहासिक परंपराएँ बनाता है | सच्चा ऐतिहासिक-बोध समाज को उसके बहु-धारिक विकास की प्रक्रिया से परिचित कराता है, किंतु उसकी नियति का अंतिम निर्णायक नहीं बनता |
मनुष्य ज्ञान और प्रयोग से अपना मार्ग स्वयं बनाता है |
आकांक्षाओं के उभरते क्षितिज जब अपने-आपको परंपराओं से अवरूद्ध पाते हैं, तब वह एक ऐसे आक्रोश के रूप में प्रकट होते हैं, जो अनेक उपयोगी और प्रकार्य-युक्त परंपराओं को भी ध्वस्त कर देते हैं | इतिहास संस्कृति को गरिमा प्रदान कर सकता है, किंतु संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसकी अनुकूलन क्षमता में निहित होती है | सम-सामयिक विश्व की चुनौतियों और बदलते परिवेश से संबद्ध समस्याओं का समाधान वह किस प्रकार करती है, इसी पर उसका भवितव्य निर्भर होता है | नए आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों द्धारा जनित सभी समस्याओं का निदान और उपचार इतिहास के पृष्ठों में मिल सकता है | विराट उपलब्धियों वाली अनेक महान संस्कृतियाँ इसीलिए क्षीण या विनष्ट हो गईं कि वह अपनी गौरवपूर्ण किंतु अप्रकार्यवादी परंपराओं से अपने-आपको मुक्त कर नयी समस्याओं के नए समाधान न खोज सकीं | मिस्र और सुमेर, एजटेक और इंका, यूनान और रोम की सभ्यताओं का ह्यास इसी कारण से हुआ |
यही हाल हमारी प्राचीन सभ्यताओं व संस्कृतियों का है | निस्संदेह हमारी प्राचीन सभ्यता की अनेक उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं | उन पर संपूर्ण मानवजाति और विशेषकर हम भारतीयों को गर्व होना ही चाहिए | परंतु इस गर्व से ही हमारे समाज के गंभीर प्रश्न हल नहीं हो सकते | जिन विशिष्ट स्थितियों ने प्राचीन भारत में विचारात्मक और कलात्मक सर्जना को प्रेरित किया था वह सम-सामयिक भारत में नहीं हैं | नए प्रतिमानों और मूल्यों ने उन्हें पहले अनुपयुक्त बना दिया और फिर अपदस्त कर दिया | आज के समाज में न केवल समस्याओं के आयाम बदले हैं, बल्कि उन पर विचार करने का ढंग भी बदल गया है | जाति-व्यवस्था किसी समय सावयवी सामाजिक संगठन का सुंदर उदाहरण रही होगी, किंतु आज के नए मानवीय मूल्यों को उसमें अंतर्निहित जन्म-जात उच्चता और हीनता की भावना स्वीकार नहीं है | कर्म और नियति के सिद्धांतों का एक उद्धात्त दार्शनिक पक्ष है, किंतु व्यावहारिक रूप में निष्क्रियता और अकर्मण्यता को पुरस्कृत करने के कारण वह आज की स्थिति में प्रगति-अवरोधक प्रमाणित होते हैं |
भारतीय सभ्यता का जो आदर्श चित्र हमारे सम्मुख है वह किसी एक युग के यथार्थ पर आधारित नहीं है | उसमें विभिन्न युगों के विभिन्न तत्त्वों का संकलन है - जो सतत प्रक्रिया के तहत संकलित हुए हैं | ऐतिहासिक संदर्भों में जिन प्रवृत्तियों का कुछ अर्थ था, नए संदर्भों में वह अर्थहीन हो गई हैं | आधुनिक मनुष्य वर्तमान में जीता है और भविष्य को नियोजित करता है | बार-बार पीछे देखने का रोग उसे आगे बढ़ने से रोकता है | गौरवमयी इतिहास का नशा उसे क्षणिक और नकली संतोष दे सकता है, पर उसकी समस्याओं को हल नहीं कर सकता | मानवीय विवेक और तर्क-संगतता की कसौटी पर जो परंपराएँ और रूढ़ियाँ अनुपयोगी हों उनसे छुटकारा पा लेने में ही सभी की भलाई है | मनुष्य ऐतिहासिक परंपराओं के अनुकरण के लिए नहीं जीता, वह जीकर ऐतिहासिक परंपराएँ बनाता है | सच्चा ऐतिहासिक-बोध समाज को उसके बहु-धारिक विकास की प्रक्रिया से परिचित कराता है, किंतु उसकी नियति का अंतिम निर्णायक नहीं बनता |
मनुष्य ज्ञान और प्रयोग से अपना मार्ग स्वयं बनाता है |