Tuesday, 13 September 2011

अनुभवरहित हो जाने के बाद प्रत्येक क्षण तुम्हारा अपना होता है

सफल होने के लिए हमें हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ नए विचारों के लिए तैयार रहना चाहिए | यह थोड़ा मुश्किल इसलिए होता है क्योंकि अतीत को लेकर हमारे मन में दृढ रूप से 'अद्धितीय' की भावना रहती है | यही वजह है कि हमारा प्रत्येक अनुभव इस भाव का शिकार रहता है | किसी स्थिति में 'अतीत' को समझने के लिए उसे वर्तमान उद्देश्य या उद्देश्य की दिशा में देखना होगा जो कि पूर्व के गुणों से प्रभावित हो | यह पूर्व समय की अवधारणा का मूल आधार है, जिस पर इतिहास या स्मृति अपनी व्यवस्था का निर्माण करते हैं | वर्तमान समय को समझने के लिए उसके तत्कालीन बोध पर अलग से विचार करने की जरूरत है | ऐसा करने के लिए संवेदना और कल्पनाओं को अलग करना पड़ेगा | वर्तमान क्षण के अतिरिक्त तुम्हारे पास कोई अन्य ज्ञान नहीं होना चाहिए | पूर्व अनुभूति का प्रत्येक पल अलग कर दिया जाए तो यह स्थाई रूप से वर्तमान बोध से अलग हो जाएगा | जैसे कि यह तुम्हारे पास कभी था ही नहीं ...| पूर्व अनुभवों को अपनाने के लिए पूर्ण रूप से अयोग्य बन जाओ | अनुभवरहित हो जाने के बाद प्रत्येक क्षण तुम्हारा अपना होता है |
जब बिना किसी पूर्व प्रभाव के तुम तार्किक ढंग से कार्य करने में सक्षम रहोगे, तब तुम सारी बातों को भूलकर सिर्फ इस बात पर ध्यान दोगे कि तुम वर्तमान में क्या कर रहे हो | इस स्थिति में तुम पूर्व व भविष्य के संदर्भों से अलग हटकर सही योजना का निर्णय ले सकोगे | यहाँ तुम्हारी चेतना जुगनू की तरह होनी चाहिए, जो सिर्फ उस जगह को प्रकाशमान करता है जहाँ वह तत्कालीन स्थिति में है | वह उस स्थिति के पीछे की सारी चीज़ों को अँधेरे में छोड़ देता है | हालाँकि व्यावहारिक जीवन में इन स्थितियों का विकसित होना अपने आप में संदेहास्पद है | मैंने यह काल्पनिक प्राकल्पना इसलिए बनाई ताकि हम विरोधाभास में अपने वर्तमान समय की वास्तविक प्रकृति समझ सकें | असल में हमारी भावनाएं इस तरह संकुचित नहीं हो सकतीं और न ही हमारी चेतना कभी जुगनू की चमक जितनी संकुचित हो सकती है | किसी भी विचार के अन्य भाग के रूप में पूर्व या भविष्य, करीब या दूर हमेशा हमारे वर्तमान ज्ञान में शामिल रहते हैं, जिसे समय का प्रवाह कहते हैं |
इसके आगे जो साधारण संवेदना हम देखते हैं, वह विचार या सोच हैं | हमारे दिमाग की सभी वास्तविक अवस्थाएं, किसी भी परिस्थिति का जटिल प्रदर्शन करती हैं | इस जटिलता का कुछ हिस्सा हाल में घटी घटनाओं की प्रतिध्वनि है और कुछ भाग भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वानुभव | अतीत धीरे-धीरे हमारे चेतन पर हल्का पड़ने लगता है | अगर वर्तमान सोच एक, दो, तीन, चार, पांच है; तो अगली सोच दो, तीन, चार, पांच, छह होगी; तथा उससे अगली तीन, चार, पांच, छह, सात होगी | धीरे-धीरे पूर्व अनुभव सफलतापूर्वक विस्मृत होते चले जायेंगे और भविष्य की नई सोच उस कमी को पूरा करती जाएगी | पूर्व स्थितियों की विस्मृति और नए का आगमन, स्मृति और आशाओं का स्रोत है - अर्थात विगत का अवलोकन और भविष्य का बोध | यही चेतन को निरंतरता देता है, जिसके बिना समय को प्रवाह के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता | समय का हमारा बोध, अन्य बोध की तरह विरोधाभास के सिद्धांत का विषय हो सकता है | मनोवैज्ञानिक इस्टल की टिप्पणी में यह तथ्य साफ दिखाई देता है | उनके अनुसार कोई भी अवधि छोटी तब लगेगी जबकि उसके तुरंत पहले हम लंबी अवधि के अंतराल का अनुभव करें | यदि यही स्थिति विपरीत होगी तो यह समय लंबा महसूस होगा |
एक व्यक्ति अपनी आँखें बंद करके बैठ जाए और बाहरी दुनिया से एकदम अलग हो जाए - वह समय बीतने का विशेष रूप से अनुभव करेगा | उसे जागे हुए व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा समय की गति का बोध होगा | इन परिस्थितियों में ऐसा जान पड़ता है कि हमारे विचारों की सामग्री में विविधता नहीं है और जो हम देखते हैं वह हमारी आँखों के नीचे शुद्ध रूप से समय उत्पन्न और समाप्त होने की कड़ी है | क्या यह सच है या नहीं, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है | यदि अनुभव वही है जैसा कि मोटे तौर पर दिखाई देता है, तो हमें एक तरह से शुद्ध समय का विशेष बोध होता है | वह बोध जिसके अनुसार खाली समय एक उद्दीपक का काम करता है | और यदि यह एक भ्रम है तो समय के बीतने का हमारा बोध उसकी पूर्ति और स्मृति के कारण होता है - वर्तमान में हम भले ही इससे सहमत हों या न हों |
सामान्यतः समय विभिन्न और रोचक अनुभवों को साथ लिए होता है | विभिन्नता से परिपूर्ण यह अवधि उस दौरान गुजरने में छोटी लगती है लेकिन जब आप उसी अवधि को घड़ी उठा कर देखते हैं तो आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि अहसास ही नहीं हुआ और पूरे दो घंटे बीत गए | दूसरी तरफ खाली समय गुजारने में लंबा लगता है, लेकिन अवधि के रूप में उसे नापें तो वह कम होता है | उदाहरण के लिए पर्यटन और प्राकृतिक दृश्यों को निहारना हमारी स्मृति में तीन सप्ताह तक बना रहता है और बीमारी का एक महीना भी मुश्किल से एक दिन की स्मृति बन पाता है | अतीत के अवलोकन की लंबाई निःसंदेह स्मृतियों की विविधता पर निर्भर करती है | जैसे ही हम पीछे मुड़ कर देखते हैं कई वस्तुएँ, घटनाएँ, परिवर्तन स्मृतियों को बड़ा कर देते हैं | वहीं खालीपन व एकरसता इसे संकुचित कर देती है |
जब भी हम किसी स्थिति के रोचक तत्वों द्धारा पूरी तरह घिरे रहते हैं तो समय बहुत जल्दी बीतता हुआ लगता है | इससे पहले कि हम जान सकें, उत्साह से भरा हुआ एक पूरा दिन गुजर जाता है | इसके विपरीत, असंतुष्ट इच्छाओं और इंतज़ार में बीता पूरा दिन अंतहीन प्रतीत होता है और नीरसता, थकावट व उबाऊपन जैसे भाव पैदा करता है | इसीलिए जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि सफल होने के लिए हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ नए विचारों के लिए तैयार रहना चाहिए |

Friday, 9 September 2011

सफल वह है, जो सबसे अलग कुछ कर गुजरता है; क्योंकि वही नया रास्ता बनाता है

कामयाबी क्या किसी पेड़ पर उगती    है ? बुद्ध के जीवन में एक राष्ट्र के राजा बनने की स्थितियाँ मौजूद थीं, किंतु वह ऐश्वर्य त्याग कर गए तो कईयों ने यही माना और कहा होगा कि उनकी किस्मत में सुख पाना और सफल होना लिखा ही नहीं होगा; लेकिन जब वह युगों के राजा बन गए तो उन्हीं लोगों ने कहा होगा कि सफल तो वह अब हुए हैं | कुछ लोग बुद्ध को सफल कहते हैं, कुछ सिद्ध | कुछ सर्वविजयी कहते हैं, कुछ सर्वत्यागी | इस सबके बीच, यह सवाल तो रह ही गया कि कामयाबी क्या है ? महत्वाकांक्षा पूरी करने या जीवन को प्रसिद्धि दिला देने के लक्ष्य की यात्रा या सब कुछ छोड़ देने की क्षमता प्राप्त करने की सिद्धि | एक आम व्यक्ति के लिए सफलता के मानदंड उसके परिवार, समाज या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का मिला-जुला खेल होते हैं | जो सबसे अलग कर गुजरता है, वही सफल है; क्योंकि वही नया रास्ता बनाता है | जोखिम लेने का साहस सफलता का आधारभूत सिद्धांत है | लेकिन सचमुच के सफल लोग, सफलता के लक्ष्य के साथ जीवन बनाने वाले लोग नहीं थे | वह अपनी प्रकृति के अनुरूप जीते गए और सफलता एक उप-उत्पाद (बाई-प्रोडक्ट) के तौर पर आती गई | हमारे लिए उनकी सफलता की चमक ऊँची थी, लेकिन उनके लिए उनका जीवन - अपनी प्रकृति के अनुरूप जिया गया जीवन महत्वपूर्ण था |

Wednesday, 29 June 2011

संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसकी अनुकूलन क्षमता में निहित होती है; उर्फ़, मनुष्य ज्ञान और प्रयोग से अपना मार्ग स्वयं बनाता है

सामाजिक जीवन में परंपराएँ महत्त्वपूर्ण होती हैं | उनकी जड़ें इतिहास की गहराइयों में होती हैं और अनेक स्थितियों में उनकी अवहेलना भी नहीं की जा सकती, किंतु अपनी ऐतिहासिकता के कारण ही परंपराएँ पूजनीय नहीं बन जाती हैं | सम-सामयिक संदर्भों में उनके विशिष्ट प्रकार्य ही उनका महत्त्व और मूल्य निर्धारित करते    हैं | समाज के बदलते परिवेश और प्रतिमानों से जिन परंपराओं का सामंजस्य नहीं होता, वह क्रमशः शक्तिहीन होती जाती हैं | उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयत्न सांस्कृतिक विसंगतियों को जन्म देते हैं | समाज जब अपने विकास के नए लक्ष्य और नई दिशाएँ निर्धारित कर उनकी प्राप्ति के लिए नियोजित प्रयास करता है तो अनेक परंपराओं में परिवर्तन करना उसके लिए अनिवार्य हो जाता है | इतिहास के आकर्षण और आधुनिकीकरण की अनिवार्यता के ध्रुवांतों के बीच अनेक समाज दिग्भ्रमित होकर अपने-आपको अनिश्चय की असहाय स्थिति में पाते हैं | परंपरा की ओर उन्मुख अभिजात वर्ग उनके इस अनिश्चय का उपयोग अपने न्यस्त स्वार्थों की साधना में करता है | एक सीमा तक यह प्रयत्न सफल भी होते हैं, किंतु अंततः वे नई इच्छाओं के विस्फोट को रोकने में समर्थ नहीं होते |
आकांक्षाओं के उभरते क्षितिज जब अपने-आपको परंपराओं से अवरूद्ध पाते हैं, तब वह एक ऐसे आक्रोश के रूप में प्रकट होते हैं, जो अनेक उपयोगी और प्रकार्य-युक्त परंपराओं को भी ध्वस्त कर देते हैं | इतिहास संस्कृति को गरिमा प्रदान कर सकता है, किंतु संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसकी अनुकूलन क्षमता में निहित होती है | सम-सामयिक विश्व की चुनौतियों और बदलते परिवेश से संबद्ध समस्याओं का समाधान वह किस प्रकार करती है, इसी पर उसका भवितव्य निर्भर होता है | नए आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों द्धारा जनित सभी समस्याओं का निदान और उपचार इतिहास के पृष्ठों में मिल सकता है | विराट उपलब्धियों वाली अनेक महान संस्कृतियाँ इसीलिए क्षीण या विनष्ट हो गईं कि वह अपनी गौरवपूर्ण किंतु अप्रकार्यवादी परंपराओं से अपने-आपको मुक्त कर नयी समस्याओं के नए समाधान न खोज सकीं | मिस्र और सुमेर, एजटेक और इंका, यूनान और रोम की सभ्यताओं का ह्यास इसी कारण से हुआ |
यही हाल हमारी प्राचीन सभ्यताओं व संस्कृतियों का है | निस्संदेह हमारी प्राचीन सभ्यता की अनेक उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं | उन पर संपूर्ण मानवजाति और विशेषकर हम भारतीयों को गर्व होना ही चाहिए | परंतु इस गर्व से ही हमारे समाज के गंभीर प्रश्न हल नहीं हो सकते | जिन विशिष्ट स्थितियों ने प्राचीन भारत में विचारात्मक और कलात्मक सर्जना को प्रेरित किया था वह सम-सामयिक भारत में नहीं हैं | नए प्रतिमानों और मूल्यों ने उन्हें पहले अनुपयुक्त बना दिया और फिर अपदस्त कर दिया | आज के समाज में न केवल समस्याओं के आयाम बदले हैं, बल्कि उन पर विचार करने का ढंग भी बदल गया है | जाति-व्यवस्था किसी समय सावयवी सामाजिक संगठन का सुंदर उदाहरण रही होगी, किंतु आज के नए मानवीय मूल्यों को उसमें अंतर्निहित जन्म-जात उच्चता और हीनता की भावना स्वीकार नहीं है | कर्म और नियति के सिद्धांतों का एक उद्धात्त दार्शनिक पक्ष है, किंतु व्यावहारिक रूप में निष्क्रियता और अकर्मण्यता को पुरस्कृत करने के कारण वह आज की स्थिति में प्रगति-अवरोधक प्रमाणित होते हैं |
भारतीय सभ्यता का जो आदर्श चित्र हमारे सम्मुख है वह किसी एक युग के यथार्थ पर आधारित नहीं है | उसमें विभिन्न युगों के विभिन्न तत्त्वों का संकलन है - जो सतत प्रक्रिया के तहत संकलित हुए हैं | ऐतिहासिक संदर्भों में जिन प्रवृत्तियों का कुछ अर्थ था, नए संदर्भों में वह अर्थहीन हो गई हैं | आधुनिक मनुष्य वर्तमान में जीता है और भविष्य को नियोजित करता है | बार-बार पीछे देखने का रोग उसे आगे बढ़ने से रोकता है | गौरवमयी इतिहास का नशा उसे क्षणिक और नकली संतोष दे सकता है, पर उसकी समस्याओं को हल नहीं कर सकता | मानवीय विवेक और तर्क-संगतता की कसौटी पर जो परंपराएँ और रूढ़ियाँ अनुपयोगी हों उनसे छुटकारा पा लेने में ही सभी की भलाई है | मनुष्य ऐतिहासिक परंपराओं के अनुकरण के लिए नहीं जीता, वह जीकर ऐतिहासिक परंपराएँ बनाता है | सच्चा ऐतिहासिक-बोध समाज को उसके बहु-धारिक विकास की प्रक्रिया से परिचित कराता है, किंतु उसकी नियति का अंतिम निर्णायक नहीं बनता |
मनुष्य ज्ञान और प्रयोग से अपना मार्ग स्वयं बनाता है |       

Sunday, 3 April 2011

निर्मल वर्मा को, उनकी स्मृति को आदर के साथ नमन !

आज निर्मल वर्मा का जन्मदिन है |
वह आज यदि जिन्दा होते तो 82 वर्ष के होते |
एक लेखक और विचारक के रूप में निर्मल वर्मा मुझे इसलिए प्रभावित करते रहे हैं कि उन्होंने इतिहासबोध और आधुनिकता को खासी जिद और मुखरता के साथ एक-दूसरे का पर्याय माना | उन्होंने भारतीय सभ्यता को नर्मदा की धारा की तरह माना/पहचाना और कहा कि यही कारण है कि हमारे यहाँ 'मैं' और 'अन्य' की समस्या नहीं है और हमारे लिए कोई पराया नहीं है | एक विचारक के रूप में निर्मल वर्मा के लिए परंपरा कोई अतीत की वस्तु नहीं है, वह सदैव एक जीवंत धड़कन की तरह हमारे भीतर रहती है और इसलिए वह निरंतर वर्तमान है - वह अपनी तात्कालिकता में शाश्वत है | परंपरा कोई अवधारणा नहीं - एक अनुभूति, एक बोध है जिसके आधार पर हमें समय और इतिहास को समझना चाहिए | सवाल उठता है कि यह परंपरा किस तरह की अनुभूति है ? निर्मल वर्मा के लिए भारतीय परंपरा का अर्थ 'संलग्नता का सर्वव्यापी बोध' है - अपने को समग्र के एक अंश के रूप में अनुभव करना - समग्र जो देश में भी व्याप्त है और काल में भी, जो प्रकृति भी है और मनुष्य भी और जिस में मनुष्य प्रकृति से उसी तरह जुड़ा है जैसे भूगोल, पेड़-पौधे या पशु-पक्षी | 'संलग्नता का यह सर्वव्यापी बोध' भारतीय चित्त का मुख्य कारक है जिसे निर्मल वर्मा 'संस्कृति का स्वप्न' कहते थे | 
निर्मल वर्मा के कथा-पुरुष के साथ अपने वर्षों के संबंध के बावजूद मैं जब भी उसका सामना करता हूँ, हर बार मुझे एक विचित्र-सी अनुभूति होती है | वह बिल्कुल वैसी ही अनुभूति है, जैसी निर्मल वर्मा के ही एक पात्र को अपने बड़े भाई को देख कर होती है | उनकी 'कव्वे और काला पानी' शीर्षक कहानी में छोटा भाई अपने बड़े भाई को देख कर सोचता है :
'.....वे सन्यासी और भाई के बीच कोई पहचाने से अजनबी जान पड़ते थे |'
थोड़ी ही गहराई में जाने पर हम पाते हैं कि मेरी अनुभूति के सादृश्य के लिए यह कोई अकेला संदर्भ नहीं है, बल्कि यह निर्मल वर्मा के तमाम पात्रों के आपसी संबंधों का ही विरोधाभास है | वे हमेशा अपनी पहचान को हल्का-सा प्रतिरोध देते हैं और न तो दूसरे को उसका 'आदी' होने देते हैं और न ही खुद उसके 'आदी' होते हैं; साथ ही वे अपनी अजनबीयत को भी इतना गहरा कभी नहीं होने देते कि आप उन्हें न पहचानने का बहाना कर सकें .... | यह विरोधाभास तब और भी चौंकाने वाला लग सकता है यदि हम एक दूसरी 'कहानी' की तरफ ध्यान दें | इस कहानी में निर्मल वर्मा खुद एक पात्र हैं और अपनी उपर्युक्त कहानी के छोटे की ही भाँति अपने एक अग्रज की ओर मुड़कर देख रहे हैं, ये अग्रज अज्ञेय हैं :
'यदि यह एक विरोधाभास न जान पड़े तो मैं इसे एक 'आत्मीय दूरी' कहना चाहूँगा, जिसमें सान्निध्य का स्नेह था तो दूरी की निस्संगता भी ....|'
यह विरोधाभास निर्मल वर्मा के संबधों में (हालाँकि तब इन्हें 'संबंध' भी कैसे कहा जा सकता है !) इतना प्रबल है कि उनके पात्रों के साथ अपने संबंध के सिलसिले में जब हम खुद इसे अनुभव करते हैं तो संशय होता है कि कहीं हमारी यह अनुभूति उस विरोधाभास की छूत का नतीजा तो नहीं है, कहीं ऐसा तो नहीं कि हम खुद भी इस विरोधाभास द्वारा आभ्यन्त्रीकृत कर लिए गए हों, और तब क्या हम इस विरोधाभास को समझ पाने की स्थिति में भी रह गए होंगे ...|
जो भी हो, हम इस दुविधा को और अधिक हवा न देते हुए, इस विरोधाभास पर ध्यान केन्द्रित करते हैं जो अपने आप में इतना मूलगामी और, अगर संक्रामक नहीं तो, इतना सर्वमान्य है कि एक साथ लेखक, उसके पात्रों और उसके पाठकों के आरपार व्याप्त है - हर संबंध की शर्त के रूप में, मानों वह संबंध के होने का ही ढंग हो | और यदि ऐसा है तो दो इकाइयों के बीच का होने से पहले उसे एक ही इकाई के आंतरिक संघटन का ही विरोधाभास होना चाहिए | व्यक्ति का अपना विरोधाभास, जिसमें वह 'स्वयं' को एक 'पहचाने हुए अजनबी' की तरह अनुभव करता है, जिसमें वह 'अपने ही साथ' एक आत्मीय दूरी पर है |
यहाँ 'व्यक्ति का विरोधाभास' कहने में इस बात पर विशेष बल है कि यह व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में ही प्रभावित करने के अर्थ में एक विरोधाभास है, यानी ऐसी स्थिति जिसमें व्यक्ति के रूप में ही उसकी पहचान दाँव पर है : वह एक ही साथ व्यक्ति है भी और नहीं भी है |  
'सृजन में सौंदर्य और नैतिकता' पर विचार करते हुए निर्मल वर्मा ने क़रीब पैंतीस वर्ष अपने कथा-लेखन की प्रक्रिया के बारे में जो कहा था, वह आज भी हमारे लिए पूरी तौर पर कारगर है | उन्होंने लिखा था : ....महत्वपूर्ण मेरे लिए अनुभव नहीं, स्मृति का वह झरोखा है जिसमें से गुज़रकर वे कहानियाँ बनते हैं | हर रचना एक तरह से सिंहावलोकन है | 'हवा' में उड़ते, आसपास मँडराते अनुभव-खण्डों में किसको पकड़ पाता हूँ, किसको जानबूझ कर छोड़ देता हूँ, किसको सहसा गुज़र जाने देता हूँ, यह महज़ संयोग पर निर्भर नहीं करता; न वह मेरी कलात्मक दक्षता या चालाक पकड़ पर निर्भर करता है; बल्कि जब तक उन अनुभव-खण्डों को मेरे भीतर का जादू-मंत्र, शून्य पर गड़े स्मृति-संकेत पास नहीं बुलाते, मैं उनका कोई फायदा नहीं उठा सकता | उनकी कभी कोई कहानी नहीं बनती |
निर्मल वर्मा अपनी रचनाओं में उस जीवन की सच्चाई को थामते हैं जो संसार में होते हुए भी सांसारिक नहीं है, यथार्थ में होते हुए भी उन मानकों के बाहर है जिनमें यथार्थ को परिभाषित, संस्थापित किया जाता है |
निर्मल वर्मा के जन्मदिन के मौके पर इन सब बातों को याद करने, रेखांकित करने में समय से मुठभेड़ करने जैसी चुनौती मुझे महसूस हुई |
निर्मल वर्मा को, उनकी स्मृति को आदर के साथ नमन !