सफल होने के लिए हमें हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ नए विचारों के लिए तैयार रहना चाहिए | यह थोड़ा मुश्किल इसलिए होता है क्योंकि अतीत को लेकर हमारे मन में दृढ रूप से 'अद्धितीय' की भावना रहती है | यही वजह है कि हमारा प्रत्येक अनुभव इस भाव का शिकार रहता है | किसी स्थिति में 'अतीत' को समझने के लिए उसे वर्तमान उद्देश्य या उद्देश्य की दिशा में देखना होगा जो कि पूर्व के गुणों से प्रभावित हो | यह पूर्व समय की अवधारणा का मूल आधार है, जिस पर इतिहास या स्मृति अपनी व्यवस्था का निर्माण करते हैं | वर्तमान समय को समझने के लिए उसके तत्कालीन बोध पर अलग से विचार करने की जरूरत है | ऐसा करने के लिए संवेदना और कल्पनाओं को अलग करना पड़ेगा | वर्तमान क्षण के अतिरिक्त तुम्हारे पास कोई अन्य ज्ञान नहीं होना चाहिए | पूर्व अनुभूति का प्रत्येक पल अलग कर दिया जाए तो यह स्थाई रूप से वर्तमान बोध से अलग हो जाएगा | जैसे कि यह तुम्हारे पास कभी था ही नहीं ...| पूर्व अनुभवों को अपनाने के लिए पूर्ण रूप से अयोग्य बन जाओ | अनुभवरहित हो जाने के बाद प्रत्येक क्षण तुम्हारा अपना होता है |
जब बिना किसी पूर्व प्रभाव के तुम तार्किक ढंग से कार्य करने में सक्षम रहोगे, तब तुम सारी बातों को भूलकर सिर्फ इस बात पर ध्यान दोगे कि तुम वर्तमान में क्या कर रहे हो | इस स्थिति में तुम पूर्व व भविष्य के संदर्भों से अलग हटकर सही योजना का निर्णय ले सकोगे | यहाँ तुम्हारी चेतना जुगनू की तरह होनी चाहिए, जो सिर्फ उस जगह को प्रकाशमान करता है जहाँ वह तत्कालीन स्थिति में है | वह उस स्थिति के पीछे की सारी चीज़ों को अँधेरे में छोड़ देता है | हालाँकि व्यावहारिक जीवन में इन स्थितियों का विकसित होना अपने आप में संदेहास्पद है | मैंने यह काल्पनिक प्राकल्पना इसलिए बनाई ताकि हम विरोधाभास में अपने वर्तमान समय की वास्तविक प्रकृति समझ सकें | असल में हमारी भावनाएं इस तरह संकुचित नहीं हो सकतीं और न ही हमारी चेतना कभी जुगनू की चमक जितनी संकुचित हो सकती है | किसी भी विचार के अन्य भाग के रूप में पूर्व या भविष्य, करीब या दूर हमेशा हमारे वर्तमान ज्ञान में शामिल रहते हैं, जिसे समय का प्रवाह कहते हैं |
इसके आगे जो साधारण संवेदना हम देखते हैं, वह विचार या सोच हैं | हमारे दिमाग की सभी वास्तविक अवस्थाएं, किसी भी परिस्थिति का जटिल प्रदर्शन करती हैं | इस जटिलता का कुछ हिस्सा हाल में घटी घटनाओं की प्रतिध्वनि है और कुछ भाग भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वानुभव | अतीत धीरे-धीरे हमारे चेतन पर हल्का पड़ने लगता है | अगर वर्तमान सोच एक, दो, तीन, चार, पांच है; तो अगली सोच दो, तीन, चार, पांच, छह होगी; तथा उससे अगली तीन, चार, पांच, छह, सात होगी | धीरे-धीरे पूर्व अनुभव सफलतापूर्वक विस्मृत होते चले जायेंगे और भविष्य की नई सोच उस कमी को पूरा करती जाएगी | पूर्व स्थितियों की विस्मृति और नए का आगमन, स्मृति और आशाओं का स्रोत है - अर्थात विगत का अवलोकन और भविष्य का बोध | यही चेतन को निरंतरता देता है, जिसके बिना समय को प्रवाह के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता | समय का हमारा बोध, अन्य बोध की तरह विरोधाभास के सिद्धांत का विषय हो सकता है | मनोवैज्ञानिक इस्टल की टिप्पणी में यह तथ्य साफ दिखाई देता है | उनके अनुसार कोई भी अवधि छोटी तब लगेगी जबकि उसके तुरंत पहले हम लंबी अवधि के अंतराल का अनुभव करें | यदि यही स्थिति विपरीत होगी तो यह समय लंबा महसूस होगा |
एक व्यक्ति अपनी आँखें बंद करके बैठ जाए और बाहरी दुनिया से एकदम अलग हो जाए - वह समय बीतने का विशेष रूप से अनुभव करेगा | उसे जागे हुए व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा समय की गति का बोध होगा | इन परिस्थितियों में ऐसा जान पड़ता है कि हमारे विचारों की सामग्री में विविधता नहीं है और जो हम देखते हैं वह हमारी आँखों के नीचे शुद्ध रूप से समय उत्पन्न और समाप्त होने की कड़ी है | क्या यह सच है या नहीं, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है | यदि अनुभव वही है जैसा कि मोटे तौर पर दिखाई देता है, तो हमें एक तरह से शुद्ध समय का विशेष बोध होता है | वह बोध जिसके अनुसार खाली समय एक उद्दीपक का काम करता है | और यदि यह एक भ्रम है तो समय के बीतने का हमारा बोध उसकी पूर्ति और स्मृति के कारण होता है - वर्तमान में हम भले ही इससे सहमत हों या न हों |
सामान्यतः समय विभिन्न और रोचक अनुभवों को साथ लिए होता है | विभिन्नता से परिपूर्ण यह अवधि उस दौरान गुजरने में छोटी लगती है लेकिन जब आप उसी अवधि को घड़ी उठा कर देखते हैं तो आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि अहसास ही नहीं हुआ और पूरे दो घंटे बीत गए | दूसरी तरफ खाली समय गुजारने में लंबा लगता है, लेकिन अवधि के रूप में उसे नापें तो वह कम होता है | उदाहरण के लिए पर्यटन और प्राकृतिक दृश्यों को निहारना हमारी स्मृति में तीन सप्ताह तक बना रहता है और बीमारी का एक महीना भी मुश्किल से एक दिन की स्मृति बन पाता है | अतीत के अवलोकन की लंबाई निःसंदेह स्मृतियों की विविधता पर निर्भर करती है | जैसे ही हम पीछे मुड़ कर देखते हैं कई वस्तुएँ, घटनाएँ, परिवर्तन स्मृतियों को बड़ा कर देते हैं | वहीं खालीपन व एकरसता इसे संकुचित कर देती है |
जब भी हम किसी स्थिति के रोचक तत्वों द्धारा पूरी तरह घिरे रहते हैं तो समय बहुत जल्दी बीतता हुआ लगता है | इससे पहले कि हम जान सकें, उत्साह से भरा हुआ एक पूरा दिन गुजर जाता है | इसके विपरीत, असंतुष्ट इच्छाओं और इंतज़ार में बीता पूरा दिन अंतहीन प्रतीत होता है और नीरसता, थकावट व उबाऊपन जैसे भाव पैदा करता है | इसीलिए जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि सफल होने के लिए हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ नए विचारों के लिए तैयार रहना चाहिए |
जब बिना किसी पूर्व प्रभाव के तुम तार्किक ढंग से कार्य करने में सक्षम रहोगे, तब तुम सारी बातों को भूलकर सिर्फ इस बात पर ध्यान दोगे कि तुम वर्तमान में क्या कर रहे हो | इस स्थिति में तुम पूर्व व भविष्य के संदर्भों से अलग हटकर सही योजना का निर्णय ले सकोगे | यहाँ तुम्हारी चेतना जुगनू की तरह होनी चाहिए, जो सिर्फ उस जगह को प्रकाशमान करता है जहाँ वह तत्कालीन स्थिति में है | वह उस स्थिति के पीछे की सारी चीज़ों को अँधेरे में छोड़ देता है | हालाँकि व्यावहारिक जीवन में इन स्थितियों का विकसित होना अपने आप में संदेहास्पद है | मैंने यह काल्पनिक प्राकल्पना इसलिए बनाई ताकि हम विरोधाभास में अपने वर्तमान समय की वास्तविक प्रकृति समझ सकें | असल में हमारी भावनाएं इस तरह संकुचित नहीं हो सकतीं और न ही हमारी चेतना कभी जुगनू की चमक जितनी संकुचित हो सकती है | किसी भी विचार के अन्य भाग के रूप में पूर्व या भविष्य, करीब या दूर हमेशा हमारे वर्तमान ज्ञान में शामिल रहते हैं, जिसे समय का प्रवाह कहते हैं |
इसके आगे जो साधारण संवेदना हम देखते हैं, वह विचार या सोच हैं | हमारे दिमाग की सभी वास्तविक अवस्थाएं, किसी भी परिस्थिति का जटिल प्रदर्शन करती हैं | इस जटिलता का कुछ हिस्सा हाल में घटी घटनाओं की प्रतिध्वनि है और कुछ भाग भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वानुभव | अतीत धीरे-धीरे हमारे चेतन पर हल्का पड़ने लगता है | अगर वर्तमान सोच एक, दो, तीन, चार, पांच है; तो अगली सोच दो, तीन, चार, पांच, छह होगी; तथा उससे अगली तीन, चार, पांच, छह, सात होगी | धीरे-धीरे पूर्व अनुभव सफलतापूर्वक विस्मृत होते चले जायेंगे और भविष्य की नई सोच उस कमी को पूरा करती जाएगी | पूर्व स्थितियों की विस्मृति और नए का आगमन, स्मृति और आशाओं का स्रोत है - अर्थात विगत का अवलोकन और भविष्य का बोध | यही चेतन को निरंतरता देता है, जिसके बिना समय को प्रवाह के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता | समय का हमारा बोध, अन्य बोध की तरह विरोधाभास के सिद्धांत का विषय हो सकता है | मनोवैज्ञानिक इस्टल की टिप्पणी में यह तथ्य साफ दिखाई देता है | उनके अनुसार कोई भी अवधि छोटी तब लगेगी जबकि उसके तुरंत पहले हम लंबी अवधि के अंतराल का अनुभव करें | यदि यही स्थिति विपरीत होगी तो यह समय लंबा महसूस होगा |
एक व्यक्ति अपनी आँखें बंद करके बैठ जाए और बाहरी दुनिया से एकदम अलग हो जाए - वह समय बीतने का विशेष रूप से अनुभव करेगा | उसे जागे हुए व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा समय की गति का बोध होगा | इन परिस्थितियों में ऐसा जान पड़ता है कि हमारे विचारों की सामग्री में विविधता नहीं है और जो हम देखते हैं वह हमारी आँखों के नीचे शुद्ध रूप से समय उत्पन्न और समाप्त होने की कड़ी है | क्या यह सच है या नहीं, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है | यदि अनुभव वही है जैसा कि मोटे तौर पर दिखाई देता है, तो हमें एक तरह से शुद्ध समय का विशेष बोध होता है | वह बोध जिसके अनुसार खाली समय एक उद्दीपक का काम करता है | और यदि यह एक भ्रम है तो समय के बीतने का हमारा बोध उसकी पूर्ति और स्मृति के कारण होता है - वर्तमान में हम भले ही इससे सहमत हों या न हों |
सामान्यतः समय विभिन्न और रोचक अनुभवों को साथ लिए होता है | विभिन्नता से परिपूर्ण यह अवधि उस दौरान गुजरने में छोटी लगती है लेकिन जब आप उसी अवधि को घड़ी उठा कर देखते हैं तो आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि अहसास ही नहीं हुआ और पूरे दो घंटे बीत गए | दूसरी तरफ खाली समय गुजारने में लंबा लगता है, लेकिन अवधि के रूप में उसे नापें तो वह कम होता है | उदाहरण के लिए पर्यटन और प्राकृतिक दृश्यों को निहारना हमारी स्मृति में तीन सप्ताह तक बना रहता है और बीमारी का एक महीना भी मुश्किल से एक दिन की स्मृति बन पाता है | अतीत के अवलोकन की लंबाई निःसंदेह स्मृतियों की विविधता पर निर्भर करती है | जैसे ही हम पीछे मुड़ कर देखते हैं कई वस्तुएँ, घटनाएँ, परिवर्तन स्मृतियों को बड़ा कर देते हैं | वहीं खालीपन व एकरसता इसे संकुचित कर देती है |
जब भी हम किसी स्थिति के रोचक तत्वों द्धारा पूरी तरह घिरे रहते हैं तो समय बहुत जल्दी बीतता हुआ लगता है | इससे पहले कि हम जान सकें, उत्साह से भरा हुआ एक पूरा दिन गुजर जाता है | इसके विपरीत, असंतुष्ट इच्छाओं और इंतज़ार में बीता पूरा दिन अंतहीन प्रतीत होता है और नीरसता, थकावट व उबाऊपन जैसे भाव पैदा करता है | इसीलिए जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि सफल होने के लिए हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ नए विचारों के लिए तैयार रहना चाहिए |

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