ओशो ने अपने एक प्रवचन में रामकृष्ण के जीवन के एक उल्लेख का बहुत ही मार्मिक विवरण प्रस्तुत किया है : रानी रासमणी, जो कि जाति से शूद्र थी, ने एक मंदिर बनवाया | चूँकि वह शूद्र थी, इसलिए उसके मंदिर में कोई ब्राह्मण पूजा करने को राजी न हुआ | हालाँकि रासमणी खुद भी कभी मंदिर में अंदर नहीं गई थी, कि कहीं मंदिर अपवित्र न हो जाए | वह शूद्र थी, इसलिए वह खुद पूजा नहीं कर सकती थी | यह सोच-सोच कर वह बड़ी दुखी थी, बड़ी पीड़ित थी कि मंदिर क्या बिना पूजा के रह जाएगा ? इसी बीच किसी ने उसे खबर दी कि गदाधर नाम का एक ब्राह्मण लड़का है, शायद वह यहाँ पूजा करने को राजी हो जाए | रासमणी को बता भी दिया गया कि गदाधर थोड़ा अलग तरह का लड़का है |
यह गदाधर ही बाद में रामकृष्ण बना |
रासमणी ने गदाधर से पूछा, गदाधर पूजा करने के लिए तैयार हो गया | उसने एक बार भी यह हिचक नहीं दिखाई कि ब्राह्मण होकर मैं शूद्र के मंदिर में कैसे जाऊँ ? उसने यही कहा कि प्रार्थना अभी यहाँ करते हैं, अब वहाँ करेंगे | घर के लोगों ने और परिचितों ने उसे बहुत रोका तथा समझाया कि वह उसे कहीं और नौकरी दिला देंगे, नौकरी के लिए अपने धर्म को क्यों खो रहा है ? गदाधर ने लेकिन एक ही बात कह कर उन्हें चुप करा दिया कि सवाल नौकरी का नहीं है; भगवान बिना पूजा के रह जाएँ, यह बात जँचती नहीं है इसलिए वहाँ पूजा करेंगे |
गदाधर ने पूजा करने के लिए अपनी सहमति दे दी थी, और रासमणी खुश थी | पर रासमणी को साथ ही यह भी बता दिया गया था कि गदाधर पूजा करने को तैयार तो हो गया है, लेकिन पूजा में यह दीक्षित नहीं है | इसने कभी किसी मंदिर में पूजा नहीं की है, यह घर पर ही पूजा करता रहा है | इसकी पूजा का कोई शास्त्रीय ढंग या विधि-विधान नहीं है | और इसकी पूजा भी जरा अनूठी है | कभी करता है, कभी नहीं भी करता है | कभी दिन भर करता है, कभी महीनों भूल जाता है | और इससे भी गड़बड़ बात यह कि यह पूजा करते वक्त पहले खुद अपने को भोग लगा लेता है, फिर भगवान को लगाता है |
रासमणी के पास लेकिन कोई विकल्प नहीं था, सो उसने इन सब बातों पर ध्यान नहीं दिया | उसने यही कहा कि जब यहाँ और कोई पूजा करने आने को तैयार नहीं है तो जो आने के लिए राजी है, उसे आने दो | कुछ तो यहाँ हो |
गदाधर आया | अपने साथ गड़बड़ें भी लाया | मंदिर में कभी पूजा होती, तो कभी मंदिर के द्धार भी नहीं खुलते | कभी दिन बीत जाते और घंटा भी न बजता, दिया भी न जलता | कभी ऐसा होता कि सुबह से प्रार्थना चलती तो शाम तक नाचते ही रहते रामकृष्ण |
रासमणी को भी चिंता हुई कि यह सब क्या है ? उन्होंने रामकृष्ण से पूछा कि यह किस तरह की पूजा है ? किस शास्त्र में लिखी है यह ?
रामकृष्ण ने कहा कि शास्त्र से पूजा का क्या संबंध है ? पूजा तो प्रेम की है | जब करने का मन ही न हो, तो करना गलत होगा | और फिर भगवान तो जान ही लेगा कि यह जो पूजा हो रही है, यह बे-मन से हो रही है, यह झूठे ही हो रही है | रामकृष्ण ने रासमणी को बता दिया कि पूजा मैं तुम्हारे लिए नहीं कर रहा हूँ, पूजा तो मैं परमात्मा के लिए कर रहा हूँ; और परमात्मा को मैं धोखा नहीं दे सकता | यह पूजा न करने से भी बड़ा पाप होगा |
विधि-विधान की बात हुई तो रामकृष्ण ने कहा कि परमात्मा जैसा करवाता है, हम वैसा करते हैं | हम अपना बनाया विधि-विधान उस पर नहीं थोपते | यह कोई क्रिया कांड नहीं है, पूजा है | यह प्रेम है | रोज जैसी भाव-दशा होती है, वैसा होता है | कभी पहले फूल चढ़ाते हैं, कभी पहले आरती करते हैं | कभी नाचते हैं, कभी शांत बैठते हैं | कभी घंटा बजाते हैं, कभी नहीं भी बजाते | जैसा आर्विभाव होता है भीतर, जैसा वह करवाता है, वैसा करते हैं | हम कोई करने वाले नहीं |
रासमणी ने कहा कि चलो यह सब छोड़ो | पर यह तो बहुत ही पाप की बात है कि तुम पहले खुद चख लेते हो, फिर भगवान को भोग लगाते हो | कहीं दुनिया में ऐसा नहीं सुना | पहले भगवान को भोग लगाओ, फिर प्रसाद ग्रहण करो | तुम भोग खुद को लगाते हो, प्रसाद भगवान को देते हो |
रामकृष्ण ने कहा कि यह तो मैं कभी न कर सकूँगा | जैसा मैं करता हूँ, वैसा ही करूँगा | मेरी माँ भी जब कुछ बनाती थी तो पहले खुद चख लेती थी, फिर मुझे देती थी | पता नहीं, देने योग्य है भी या नहीं | जो मेरी माँ न कर सकी मेरे साथ, वह मैं भगवान के साथ कैसे कर सकता हूँ ? कभी मिठाई में शक्कर ज्यादा होती है, वह जब मुझे ही नहीं अच्छी लगती, तो मैं उसे भगवान को कैसे दे सकता हूँ ? कभी शक्कर होती ही नहीं, बिना शक्कर वाली मिठाई जब मैं ही नहीं खा सकता तो उसे भगवान को कैसे चढ़ा दूँ | यह पाप नहीं होगा क्या ?
इस प्रसंग से यही संदेश निकलता है कि प्रेम से जो भक्ति उठती है, वह तो रोज नई-नई ही होगी | उसका कोई क्रिया कांड नहीं होगा | नहीं हो सकता है | उसका कोई बंधा हुआ ढाँचा नहीं हो सकता है | प्रेम भी कहीं ढांचे में हुआ है ? पूजा का भी कहीं कोई शास्त्र है ? प्रार्थना की भी कोई विधि है ? वह तो भाव का सहज आवेदन है | भाव की तरंग है |
यह गदाधर ही बाद में रामकृष्ण बना |
रासमणी ने गदाधर से पूछा, गदाधर पूजा करने के लिए तैयार हो गया | उसने एक बार भी यह हिचक नहीं दिखाई कि ब्राह्मण होकर मैं शूद्र के मंदिर में कैसे जाऊँ ? उसने यही कहा कि प्रार्थना अभी यहाँ करते हैं, अब वहाँ करेंगे | घर के लोगों ने और परिचितों ने उसे बहुत रोका तथा समझाया कि वह उसे कहीं और नौकरी दिला देंगे, नौकरी के लिए अपने धर्म को क्यों खो रहा है ? गदाधर ने लेकिन एक ही बात कह कर उन्हें चुप करा दिया कि सवाल नौकरी का नहीं है; भगवान बिना पूजा के रह जाएँ, यह बात जँचती नहीं है इसलिए वहाँ पूजा करेंगे |
गदाधर ने पूजा करने के लिए अपनी सहमति दे दी थी, और रासमणी खुश थी | पर रासमणी को साथ ही यह भी बता दिया गया था कि गदाधर पूजा करने को तैयार तो हो गया है, लेकिन पूजा में यह दीक्षित नहीं है | इसने कभी किसी मंदिर में पूजा नहीं की है, यह घर पर ही पूजा करता रहा है | इसकी पूजा का कोई शास्त्रीय ढंग या विधि-विधान नहीं है | और इसकी पूजा भी जरा अनूठी है | कभी करता है, कभी नहीं भी करता है | कभी दिन भर करता है, कभी महीनों भूल जाता है | और इससे भी गड़बड़ बात यह कि यह पूजा करते वक्त पहले खुद अपने को भोग लगा लेता है, फिर भगवान को लगाता है |
रासमणी के पास लेकिन कोई विकल्प नहीं था, सो उसने इन सब बातों पर ध्यान नहीं दिया | उसने यही कहा कि जब यहाँ और कोई पूजा करने आने को तैयार नहीं है तो जो आने के लिए राजी है, उसे आने दो | कुछ तो यहाँ हो |
गदाधर आया | अपने साथ गड़बड़ें भी लाया | मंदिर में कभी पूजा होती, तो कभी मंदिर के द्धार भी नहीं खुलते | कभी दिन बीत जाते और घंटा भी न बजता, दिया भी न जलता | कभी ऐसा होता कि सुबह से प्रार्थना चलती तो शाम तक नाचते ही रहते रामकृष्ण |
रासमणी को भी चिंता हुई कि यह सब क्या है ? उन्होंने रामकृष्ण से पूछा कि यह किस तरह की पूजा है ? किस शास्त्र में लिखी है यह ?
रामकृष्ण ने कहा कि शास्त्र से पूजा का क्या संबंध है ? पूजा तो प्रेम की है | जब करने का मन ही न हो, तो करना गलत होगा | और फिर भगवान तो जान ही लेगा कि यह जो पूजा हो रही है, यह बे-मन से हो रही है, यह झूठे ही हो रही है | रामकृष्ण ने रासमणी को बता दिया कि पूजा मैं तुम्हारे लिए नहीं कर रहा हूँ, पूजा तो मैं परमात्मा के लिए कर रहा हूँ; और परमात्मा को मैं धोखा नहीं दे सकता | यह पूजा न करने से भी बड़ा पाप होगा |
विधि-विधान की बात हुई तो रामकृष्ण ने कहा कि परमात्मा जैसा करवाता है, हम वैसा करते हैं | हम अपना बनाया विधि-विधान उस पर नहीं थोपते | यह कोई क्रिया कांड नहीं है, पूजा है | यह प्रेम है | रोज जैसी भाव-दशा होती है, वैसा होता है | कभी पहले फूल चढ़ाते हैं, कभी पहले आरती करते हैं | कभी नाचते हैं, कभी शांत बैठते हैं | कभी घंटा बजाते हैं, कभी नहीं भी बजाते | जैसा आर्विभाव होता है भीतर, जैसा वह करवाता है, वैसा करते हैं | हम कोई करने वाले नहीं |
रासमणी ने कहा कि चलो यह सब छोड़ो | पर यह तो बहुत ही पाप की बात है कि तुम पहले खुद चख लेते हो, फिर भगवान को भोग लगाते हो | कहीं दुनिया में ऐसा नहीं सुना | पहले भगवान को भोग लगाओ, फिर प्रसाद ग्रहण करो | तुम भोग खुद को लगाते हो, प्रसाद भगवान को देते हो |
रामकृष्ण ने कहा कि यह तो मैं कभी न कर सकूँगा | जैसा मैं करता हूँ, वैसा ही करूँगा | मेरी माँ भी जब कुछ बनाती थी तो पहले खुद चख लेती थी, फिर मुझे देती थी | पता नहीं, देने योग्य है भी या नहीं | जो मेरी माँ न कर सकी मेरे साथ, वह मैं भगवान के साथ कैसे कर सकता हूँ ? कभी मिठाई में शक्कर ज्यादा होती है, वह जब मुझे ही नहीं अच्छी लगती, तो मैं उसे भगवान को कैसे दे सकता हूँ ? कभी शक्कर होती ही नहीं, बिना शक्कर वाली मिठाई जब मैं ही नहीं खा सकता तो उसे भगवान को कैसे चढ़ा दूँ | यह पाप नहीं होगा क्या ?
इस प्रसंग से यही संदेश निकलता है कि प्रेम से जो भक्ति उठती है, वह तो रोज नई-नई ही होगी | उसका कोई क्रिया कांड नहीं होगा | नहीं हो सकता है | उसका कोई बंधा हुआ ढाँचा नहीं हो सकता है | प्रेम भी कहीं ढांचे में हुआ है ? पूजा का भी कहीं कोई शास्त्र है ? प्रार्थना की भी कोई विधि है ? वह तो भाव का सहज आवेदन है | भाव की तरंग है |

No comments:
Post a Comment