व्यक्तियों की कथा को ओशो ने एक पत्थर की 'हरकत' के जरिये दिलचस्प रूप में कहा है : एक महल के पास पत्थरों का एक ढेर लगा था | एक छोटा बच्चा वहाँ से निकला और उसने एक पत्थर उठा कर महल की खिड़की की तरफ फेंका | आकांक्षा तो सभी पत्थरों में होती है कि काश उन्हें पंख लग जाएँ और वह आकाश में उड़ें | इस पत्थर ने भी आकाश में उड़ने के सपने देखे थे | आज जब उसने अपने को उड़ता हुआ पाया तो अपने साथियों से गर्व से बोला कि मित्रों, मैं आकाश की सैर को जा रहा हूँ | यह कहते हुए उसने अपने आप को विशिष्ट, असाधारण, अद्धितीय, महान, सौभाग्यशाली माना | दूसरे पत्थरों को उसे उड़ता हुआ देख कर ईर्ष्या तो हो रही थी, जलन तो हो रही थी - लेकिन चूँकि वह उसका उड़ना प्रत्यक्ष देख रहे थे इसलिए उन्हें भी यही लगा कि वह विशिष्ट, असाधारण, अद्धितीय, महान, सौभाग्यशाली है |
पत्थर फेंका गया था | लेकिन उस पत्थर ने और दूसरे पत्थरों ने भी यही सोचा/समझा कि वह उड़ रहा है |
महल की खिड़की की तरफ फेंका गया पत्थर खिड़की के काँच से टकराया और काँच चकनाचूर हो गया | पत्थर ने अकड़ के साथ कहा कि हज़ार बार कहा है कि मेरे मार्ग में कोई न आये | आएगा तो चकनाचूर हो जाएगा | अब भुगतो |
पत्थर ने अपनी अकड़ के चलते इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया कि उसने काँच को चकनाचूर नहीं किया है | यह तो पत्थर और काँच को जो स्वभाव मिला है - जिसके चलते जब भी वह दोनों टकरायेंगे, काँच ही चकनाचूर होगा - उसका स्वाभाविक नतीज़ा है | क्या यह पत्थर के बस में था कि वह काँच से टकराता और काँच को न तोड़ता ? क्या पत्थर यह तय कर सकता है कि काँच से टकराने के बाद वह चाहे तो काँच टूटे और चाहे तो न टूटे | ज़ाहिर है कि जो हुआ वह हो रहा था - वह किया नहीं जा रहा था |
पत्थर लेकिन इसी बात पर अकड़ा हुआ था कि जो हुआ है, वह उसी ने किया है |
काँच से टकराने के कारण पत्थर की गति भी टूट गई थी | बच्चे के हाथ से फेंके जाने के कारण उसे जो बल मिला था, वह काँच से टकराने से मिले प्रतिरोध के कारण खत्म हो गया था | इसका नतीज़ा यह हुआ कि पत्थर खिड़की के पार महल में बिछे कालीन पर गिर गया |
पत्थर गिरा था, लेकिन उसकी अकड़ ढीली नहीं पड़ी थी | उसने कहा कि वह चूँकि थक गया है इसलिए आराम करने के लिए यहाँ लेट गया है | चारों तरफ का नज़ारा देख कर तो वह और भी प्रफुल्लित हुआ - उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसके आने की खबर यहाँ पहले ही पहुँच गई थी और यहाँ के लोगों ने उसके स्वागत की तैयारियाँ भी कर रखी थीं : कालीन बिछा दिए गए थे, चित्र सजा दिए गए थे, फानूस लटका दिए गए थे, रोशनी का पूरा इंतजाम कर दिया गया था | यह देख कर पत्थर ने अपने आप को अतिथि समझा और अपनी इस सोच को और पुख्ता किया कि वह कोई साधारण पत्थर नहीं है |
इस बीच काँच के टूटने की आवाज से नौकर भागता हुआ अंदर आया और उसने पत्थर को देखा तो उसे वहाँ से हटाने/फेंकने के लिए उसे हाथ में उठा लिया | पत्थर ने अपनी किस्मत पर फिर गर्व किया | उसने कहा कि राजा ने उसे बुलवा भेजा है | अपने खास नौकर को उसे लेने भेजा है |
राजा को पत्थर का कुछ पता भी न था | काँच के टूटने की उसने कोई आवाज भी न सुनी होगी | नौकर ने भी पत्थर को फेंकने के लिए ही हाथ में उठाया था | पर पत्थर झूठे ही कहानियाँ बना रहा था | नौकर ने पत्थर को वापस फेंक भी दिया था | पत्थर ने लेकिन इतराना फिर भी नहीं छोड़ा | उसने अब यह कहना शुरू किया कि उसे अपने प्रियजनों की याद आ रही थी इसलिए उसने राजा के पास जाने से इंकार कर दिया और अपने घर अपने लोगों के बीच वापस लौट आया है | उसने कहा कि अपना घर अपना होता है; पराये महलों में रुकने में वह आराम कहाँ जो अपने झोपड़े में मिलता है |
यह किस्सा सुना कर ओशो ने कहा कि सभी व्यक्तियों की यही कहानी है | जो होता है, उसे कहते हैं कि उन्होंने किया है | करने की बात को उन्होंने भ्रान्ति कहा है | उन्होंने कहा कि तुम कुछ कर नहीं सकते, तुम सिर्फ हो सकते हो | तुम सोचते हो कि तुम कर रहे हो - तुम करते हुए नज़र भी आ रहे हो, लेकिन सच यह है कि तब भी तुम नहीं कर रहे | तुम सिर्फ भ्रान्ति ढो रहे होते हो |
पत्थर फेंका गया था | लेकिन उस पत्थर ने और दूसरे पत्थरों ने भी यही सोचा/समझा कि वह उड़ रहा है |
महल की खिड़की की तरफ फेंका गया पत्थर खिड़की के काँच से टकराया और काँच चकनाचूर हो गया | पत्थर ने अकड़ के साथ कहा कि हज़ार बार कहा है कि मेरे मार्ग में कोई न आये | आएगा तो चकनाचूर हो जाएगा | अब भुगतो |
पत्थर ने अपनी अकड़ के चलते इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया कि उसने काँच को चकनाचूर नहीं किया है | यह तो पत्थर और काँच को जो स्वभाव मिला है - जिसके चलते जब भी वह दोनों टकरायेंगे, काँच ही चकनाचूर होगा - उसका स्वाभाविक नतीज़ा है | क्या यह पत्थर के बस में था कि वह काँच से टकराता और काँच को न तोड़ता ? क्या पत्थर यह तय कर सकता है कि काँच से टकराने के बाद वह चाहे तो काँच टूटे और चाहे तो न टूटे | ज़ाहिर है कि जो हुआ वह हो रहा था - वह किया नहीं जा रहा था |
पत्थर लेकिन इसी बात पर अकड़ा हुआ था कि जो हुआ है, वह उसी ने किया है |
काँच से टकराने के कारण पत्थर की गति भी टूट गई थी | बच्चे के हाथ से फेंके जाने के कारण उसे जो बल मिला था, वह काँच से टकराने से मिले प्रतिरोध के कारण खत्म हो गया था | इसका नतीज़ा यह हुआ कि पत्थर खिड़की के पार महल में बिछे कालीन पर गिर गया |
पत्थर गिरा था, लेकिन उसकी अकड़ ढीली नहीं पड़ी थी | उसने कहा कि वह चूँकि थक गया है इसलिए आराम करने के लिए यहाँ लेट गया है | चारों तरफ का नज़ारा देख कर तो वह और भी प्रफुल्लित हुआ - उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसके आने की खबर यहाँ पहले ही पहुँच गई थी और यहाँ के लोगों ने उसके स्वागत की तैयारियाँ भी कर रखी थीं : कालीन बिछा दिए गए थे, चित्र सजा दिए गए थे, फानूस लटका दिए गए थे, रोशनी का पूरा इंतजाम कर दिया गया था | यह देख कर पत्थर ने अपने आप को अतिथि समझा और अपनी इस सोच को और पुख्ता किया कि वह कोई साधारण पत्थर नहीं है |
इस बीच काँच के टूटने की आवाज से नौकर भागता हुआ अंदर आया और उसने पत्थर को देखा तो उसे वहाँ से हटाने/फेंकने के लिए उसे हाथ में उठा लिया | पत्थर ने अपनी किस्मत पर फिर गर्व किया | उसने कहा कि राजा ने उसे बुलवा भेजा है | अपने खास नौकर को उसे लेने भेजा है |
राजा को पत्थर का कुछ पता भी न था | काँच के टूटने की उसने कोई आवाज भी न सुनी होगी | नौकर ने भी पत्थर को फेंकने के लिए ही हाथ में उठाया था | पर पत्थर झूठे ही कहानियाँ बना रहा था | नौकर ने पत्थर को वापस फेंक भी दिया था | पत्थर ने लेकिन इतराना फिर भी नहीं छोड़ा | उसने अब यह कहना शुरू किया कि उसे अपने प्रियजनों की याद आ रही थी इसलिए उसने राजा के पास जाने से इंकार कर दिया और अपने घर अपने लोगों के बीच वापस लौट आया है | उसने कहा कि अपना घर अपना होता है; पराये महलों में रुकने में वह आराम कहाँ जो अपने झोपड़े में मिलता है |
यह किस्सा सुना कर ओशो ने कहा कि सभी व्यक्तियों की यही कहानी है | जो होता है, उसे कहते हैं कि उन्होंने किया है | करने की बात को उन्होंने भ्रान्ति कहा है | उन्होंने कहा कि तुम कुछ कर नहीं सकते, तुम सिर्फ हो सकते हो | तुम सोचते हो कि तुम कर रहे हो - तुम करते हुए नज़र भी आ रहे हो, लेकिन सच यह है कि तब भी तुम नहीं कर रहे | तुम सिर्फ भ्रान्ति ढो रहे होते हो |

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