Wednesday, 9 April 2014

"धार्मिक व्यक्ति वह है, संन्यस्त वह है, सन्यासी वह है - जो कर्ता के भाव से नहीं जीता, साक्षी के भाव से जीता है" : ओशो


स्वयं की खोज अंततः उसकी खोज है, जिसके समक्ष सारे अनुभव घटित होते हैं । जिसके समक्ष सारी प्रतीतियाँ फलित होती हैं । जिसके समक्ष सारे दृश्य, सारे जगत का विस्तार प्रगट होता है ।
एक पत्थर है - वह है जरूर, लेकिन होने का उसे कोई अनुभव नहीं है । उसके होने में कोई कमी नहीं है, लेकिन होने की कोई चेतना उसके पास नहीं है । एक पशु है - वह भी है और उसे होने का बोध भी है । उसका अस्तित्व भी है और अस्तित्व का उसे अनुभव भी है । पत्थर का सिर्फ अस्तित्व है, अस्तित्व का कोई अनुभव नहीं है । पशु का अस्तित्व भी है, अस्तित्व का अनुभव भी है । मनुष्य में चेतना का एक तीसरा आयाम भी शुरू होता है । मनुष्य है, उसी तरह जैसे पत्थर है; मनुष्य को होने का अनुभव भी है, उसी तरह जैसे किसी पशु को है; और मनुष्य इन दोनों का भी साक्षी हो सकता है । मनुष्य यह भी जान सकता है कि मैं हूँ, मुझे होने का अनुभव हो रहा है और इन दोनों बातों को भी पीछे खड़े होकर अनुभव कर सकता है ।
यह जो तीसरे का अनुभव है, यह साक्षी है । पत्थर अचेतन है, पशु चेतन है, मनुष्य अपने चैतन्य के प्रति भी चेतन है । अपनी चेतना के प्रति भी जागा हुआ है । लेकिन, यह मनुष्य की संभावना है । सभी मनुष्य इस अवस्था में नहीं हैं । यह हो सकता है, यह है नहीं । साधारणतः अधिकतर मनुष्य पशु के स्तर पर ही होते हैं - जहाँ हैं और होने का पता है; लेकिन तीसरे तत्व का, साक्षी का कोई अनुभव नहीं है । और यह अवस्था भी सिर्फ जाग्रत में रहती है । निद्रा में तो हालत वही हो जाती है जो पत्थर की है । हैं, लेकिन होने का कोई पता नहीं ।
जब हम नींद में हैं तो हमारी और पत्थर की अवस्था में कोई भी फर्क नहीं है । जब हम गहरी प्रसुप्ति में पड़े हैं तो हम ठीक पत्थर जैसे हैं । और जब हमें साक्षी का कोई पता नहीं है, होने का ख्याल है बस, तो हम पशु की अवस्था में हैं । लेकिन वास्तविक मनुष्यता का जन्म हमारे भीतर 'विटनेसिंग', साक्षी के साथ शुरू होता है ।
साक्षी का अर्थ है, किसी चीज के साथ अलग हो जाना । अगर कोई व्यक्ति अपने समस्त अनुभवों से अलग हो जाए - वह अनुभव चाहे सुख के हों, या दुःख के; तो साक्षी का अनुभव शुरू होता है ।
साक्षी का अर्थ है कि कोई भी अनुभव तादात्म्य न बने । कोई भी अनुभव, मुझसे न जुड़े । जैसे रास्ते पर आप चल रहे हैं - ऐसे भी चल सकते हैं कि मैं चल रहा हूँ और ऐसे भी चल सकते हैं कि चलने की घटना घट रही है और मैं देख रहा हूँ । खाना खा रहे हैं - ऐसे भी खा सकते हैं कि मैं खा रहा हूँ और ऐसे भी खा सकते हैं कि खाना खाया जा रहा है, मैं देख रहा हूँ । हर घटना से तादात्म्य को छिन्न-भिन्न करना पड़े । हर घटना से तादात्म्य विसर्जित करना पड़े । वह चेतना जो सिर्फ देखती है, दृष्टा होती है । जानती है, ज्ञाता होती है । लेकिन भोक्ता नहीं होती ।
हमारा अनुभव तीन हिस्सों में विभाजित है - भोग, भोग्य और भोक्ता । भोग्य, जिसे हम भोगते हैं । भोजन हम कर रहे हैं, तो भोजन भोग्य है । हम कर रहे हैं, हम भोक्ता हैं । भोक्ता और भोग्य के बीच जो संबंध है, उसका नाम भोग है । भोग संबंध है । इसे ऐसे भी समझ सकते हैं : सूरज निकला है, हम देख रहे हैं । यहाँ सूरज दृश्य है, हम दृष्टा हैं, और दोनों के बीच का संबंध दर्शन है । पैर में कांटा गड़ गया है, पीड़ा हो रही है - यहाँ पीड़ा ज्ञेय है, हम ज्ञाता हैं, बीच का संबंध ज्ञान है । हर अनुभव तीन हिस्सों में टूटता है : विषय - जो बाहर है, जिसका हमें अनुभव हो रहा है । अनुभोक्ता, अस्मिता, अहंकार जो भीतर है, जिसको अनुभव हो रहा है । और दोनों के बीच का संबंध जो अनुभव बन रहा है ।
ये तीन समझ में आते हैं । इन तीनों के पार अगर आपके भीतर कोई चौथा भी है, तो उसका नाम साक्षी है । इन तीनों के पार अगर कोई चौथा भी हो जो इन तीनों को ऊपर से देख रहा हो - जो देख रहा हो कि भोजन किया जा रहा है, भोग लिया जा रहा है, भोक्ता भोग ले रहा है और भोक्ता व भोग के बीच में संबंध निर्धारित हो गया है भोग का; इन तीनों के पार भी अगर कोई खड़ा होकर देख सके आपके भीतर, तो उस चौथी संभावना का नाम साक्षी है ।
तीन स्थितियों को तो हम अनुभव करते हैं, चौथे को हम अनुभव नहीं करते हैं । उस चौथे को जगाना, उस चौथे को उठाना, उस चौथे को आधार देना, उस चौथे में प्रवेश करना, उसका ही साधन ध्यान है ।
जो भी आप कर रहे हों, खयाल रखें कि तीन तो ठीक हैं - चौथा भी कहीं है या नहीं ? और जैसे ही खयाल रखेंगे, चौथा जागना शुरू हो जायेगा । क्योंकि वह स्मरण से ही जागता है । उसे जगाने का और कोई उपाय नहीं है ।
साक्षी में 'मैं' का अतिक्रमण हो जाता है ।
इसलिए जिस दिन साक्षी का अनुभव शुरू होगा उस दिन 'मैं' का अनुभव समाप्त हो जायेगा । या इसे ऐसा समझे कि 'मैं' का अनुभव यदि समाप्त कर दें, तो साक्षी का अनुभव शुरू हो जायेगा । जब तक 'मैं' निर्मित होता है, तब तक जानना कि कर्ता का काम जारी है और साक्षी से अभी कोई संबंध नहीं हुआ है ।
 जीवन की प्रक्रिया का ठीक-ठीक बोध हो, तो पता चलेगा कि कर्ता हम हैं ही नहीं । फिर हम क्या हैं अगर कर्ता नहीं हैं ? अगर यह कर्ता का भाव छूट जाये तो फिर हम क्या हैं ? 
तब हमें पता चलेगा कि हम साक्षी हैं ।
एक बात और खयाल में लेनी चाहिए - जो लोग कर्ता भाव से जीते हैं, अगर वह धार्मिक भी हो जाएँ तो भी उनका कर्ता भाव नहीं जाता है । वह वहाँ भी कर्तापन लगाए रखते हैं । पहले वह कहते थे कि हमने महल बनाया, अब वह कहते हैं कि हमने आश्रम बनाया । पहले भोग भोगा, अब त्याग किया । यानि उनका करना जारी रहा ।
धार्मिक व्यक्ति वह है, संन्यस्त वह है, सन्यासी वह है - जो कर्ता के भाव से नहीं जीता; चाहे महल में रहता हो, चाहे झोपड़े में रहता हो । एक बात ही उसका गुण है कि वह कर्ता के भाव से नहीं जीता; वह साक्षी के भाव से जीता है ।

Saturday, 5 April 2014

जिस दिन खंडों के बीच अखंड की प्रतीति शुरू होती है, उसी दिन ब्रह्म की यात्रा पर हम निकलते हैं : ओशो


जीवन खंडों में विभाजित नहीं, अखंड है । खंडों में विभाजित दिखायी पड़ता है तो भी अखंड है । बहुत तरह के खंड दिखाई पड़ते हैं, लेकिन सभी खंड मूल आधार में संयुक्त हैं और इकट्ठे हैं । अन्यथा जगत के होने की संभावना ही नहीं है, अस्तित्व के होने की संभावना ही नहीं है । अस्तित्व बिखर जाए, अगर खंडों में हो । अस्तित्व बिखरता नहीं, क्योंकि खंडों में बँटा हुआ नहीं है, अखंड है ।
भौतिकविद के लिए अणु हैं, परमाणु हैं, इलेक्ट्रॉन हैं - और इन सब से मिलकर पदार्थ बना है । ठीक ऐसे ही चैतन्य के भी कण हैं, जीवकोश हैं - जिनसे मिल कर जीवन बना है । इस विराट जीवन को खंड-खंड में देखना ही विज्ञान है, इसको अखंड देख पाना धर्म है ।
वैज्ञानिक कहेगा कि जीवकोश रासायनिक पदार्थों का जोड़ है और व्यक्ति की आत्मा इन जीवकोशों का जोड़ है । धर्म इसकी ठीक विपरीत मान्यता है । धर्म कहता है, खंड का जोड़ नहीं है अखंड । खंड अखंड का भाव है । अखंड खंडों का जोड़ नहीं है । खंड अखंड का भाग है । खंडों के जोड़ से अखंड नहीं बनता, अखंड अपनी हैसियत से है । वह कोई गणितीय जोड़ नहीं है, सावयव एकता है । अखंड अपनी हैसियत से है, खंडों को उसका पता नहीं है । क्योंकि खंड को अखंड का पता इसलिए नहीं होता कि खंड अपने भीतर ही बंधकर जीता है । उसे पता नहीं है । जब खंड अपने से बाहर निकलता है, अपने से ऊपर उठता है, जागकर अपने से पार देखता है, तब उसे अखंड की प्रतीति शुरू होती है ।
इसे ऐसे समझें कि माँ के पेट में एक बच्चा है गर्भ में, उसे इस जगत का कोई पता नहीं है । क्यों पता नहीं है ? क्योंकि माँ के पेट में जो बच्चा है, वह अपनी ही हैसियत से एक इकाई है । और उसका जगत से कोई सीधा संबंध नहीं है । उसे पता भी नहीं है कि सूरज निकलता है, चाँद-तारे हैं; उसे पता भी नहीं है कि लोग हैं, विराट जगत है, उसे कुछ भी पता नहीं है । और गर्भ के भीतर बच्चा इतना सुनिश्चित इकाई में बँधा हुआ है कि वह अपने को ही जगत मान ले तो कोई आश्चर्य नहीं है । क्योंकि न उसे खाने के लिए आयोजन करना पड़ता है, न उसे पीने के लिए आयोजन करना पड़ता है, न उसे आत्मरक्षा के लिए आयोजन करना पड़ता है - उसे कुछ करना ही नहीं पड़ता है, वह सिर्फ होता है । और परिपूर्ण होता है । उसको कहीं कोई कमी नहीं होती । उसे खयाल भी नहीं आ सकता कि मुझसे अलग भी कुछ है । लेकिन गर्भ के बाहर आएगा, अपनी सीमाओं को तोड़ेगा तो जगत का प्रारंभ होगा ।
इसलिए वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे का जन्म जो है, बहुत 'ट्रामेटिक' है, उसे बड़ा धक्का लगता है । एकदम एक सीमा में बँधा हुआ अस्तित्व था, एकदम से टूट जाता है और एक असीम जगत में खड़ा हो जाता है जहाँ कुछ भी सूझता नहीं है । पहली बार पता चलता है, मैं ही नहीं हूँ और भी बहुत कुछ है । मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह धक्का इतना गहरा है कि जिंदगी भर इस धक्के से आदमी संभल नहीं पाता है । और मनोवैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं - इसमें सच्चाई भी दिखती है - कि आदमी जो शांति की खोज करता है, आनंद की खोज करता है, स्वतंत्रता की खोज करता है, आत्मा की खोज करता है, परमात्मा की खोज करता है, यह अपने गर्भ के अनुभव के कारण करता है । क्योंकि गर्भ में वह परम स्वतंत्र था, परम आनंदित था, परम शांत था, कोई तनाव न था, कोई सीमा न थी, जीवन पूरा का पूरा उपलब्ध था, उसमें कहीं कोई बाधा न थी; कोई जिम्मेवारी न थी, कोई बोझ न था, कोई चिंता न थी ।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह जो मोक्ष की खोज है, उस गर्भ में अनुभव हुई शांति के ही कारण है । क्योंकि वह गहरा अनुभव है और फिर उसके बाद जगत का गहरा धक्का है ।
मोक्ष की जो हमारी धारणा है, वह विराट गर्भ की है । उसे हमने हिरण्यमय गर्भ कहा भी है - 'द वूंब ऑफ द डिवाइन' । वह जो परमात्मा का गर्भ है, उसमें मैं ऐसे लीन हो जाऊँ जैसे माँ के गर्भ में था । न कोई चिंता, न कोई पीड़ा, न पराये का पता । लेकिन बच्चा बाहर आता है तो उसे जगत दिखाई पड़ता है ।
बीज टूटता है, अंकुरित होता है तो उसे सूरज के दर्शन होते हैं । जहाँ तक हमारी स्थिति है, जैसे हम हैं, अभी हम अहंकार की खोल में बंद हैं । उसके पार हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता । मैं-ही-मैं दिखायी पड़ता हूँ । अगर कभी थोड़ी बहुत झलक किसी की मिलती भी है तो वह भी 'मेरे' होने के कारण मिलती है । 'मेरा' मित्र है, 'मेरा' भाई है, 'मेरी' पत्नी है, 'मेरा' पति है । तो 'मेरे' से कहीं थोड़ा-सा संबंध जुड़ता है तो थोड़ी-सी झलक मुझे मिलती है । बस यही मेरा जगत है । इसके पार जो विराट फैला हुआ है, उसका मुझे कोई पता नहीं है । धर्म एक पुनर्जन्म है, एक 'रिबर्थ' । एक और गर्भ को तोड़ना है । यह अहंकार को भी तोड़ देना है । लेकिन यह अहंकार तभी टूटे, जब मेरे खंडों का जो जोड़ है उसके पार मुझमें कोई अंकुरण शुरू हो जाए । कुछ भिन्न मेरे भीतर जागने लगे, मेरे जोड़ से ज्यादा । जिस दिन खंडों के बीच अखंड की प्रतीति शुरू होती है, उसी दिन ब्रह्म की यात्रा पर हम निकलते हैं ।