जीवन खंडों में विभाजित नहीं,
अखंड है । खंडों में विभाजित दिखायी पड़ता है तो भी अखंड है । बहुत तरह के
खंड दिखाई पड़ते हैं, लेकिन सभी खंड मूल आधार में संयुक्त हैं और इकट्ठे हैं
। अन्यथा जगत के होने की संभावना ही नहीं है, अस्तित्व के होने की संभावना ही नहीं है । अस्तित्व बिखर जाए, अगर खंडों में हो । अस्तित्व बिखरता नहीं, क्योंकि खंडों में बँटा हुआ नहीं है, अखंड है ।
भौतिकविद के लिए अणु हैं, परमाणु हैं, इलेक्ट्रॉन हैं - और इन सब से मिलकर पदार्थ बना है । ठीक ऐसे ही चैतन्य के भी कण हैं, जीवकोश हैं - जिनसे मिल कर जीवन बना है । इस विराट जीवन को खंड-खंड में देखना ही विज्ञान है, इसको अखंड देख पाना धर्म है ।
वैज्ञानिक कहेगा कि जीवकोश रासायनिक पदार्थों का जोड़ है और व्यक्ति की आत्मा इन जीवकोशों का जोड़ है । धर्म इसकी ठीक विपरीत मान्यता है । धर्म कहता है, खंड का जोड़ नहीं है अखंड । खंड अखंड का भाव है । अखंड खंडों का जोड़ नहीं है । खंड अखंड का भाग है । खंडों के जोड़ से अखंड नहीं बनता, अखंड अपनी हैसियत से है । वह कोई गणितीय जोड़ नहीं है, सावयव एकता है । अखंड अपनी हैसियत से है, खंडों को उसका पता नहीं है । क्योंकि खंड को अखंड का पता इसलिए नहीं होता कि खंड अपने भीतर ही बंधकर जीता है । उसे पता नहीं है । जब खंड अपने से बाहर निकलता है, अपने से ऊपर उठता है, जागकर अपने से पार देखता है, तब उसे अखंड की प्रतीति शुरू होती है ।
इसे ऐसे समझें कि माँ के पेट में एक बच्चा है गर्भ में, उसे इस जगत का कोई पता नहीं है । क्यों पता नहीं है ? क्योंकि माँ के पेट में जो बच्चा है, वह अपनी ही हैसियत से एक इकाई है । और उसका जगत से कोई सीधा संबंध नहीं है । उसे पता भी नहीं है कि सूरज निकलता है, चाँद-तारे हैं; उसे पता भी नहीं है कि लोग हैं, विराट जगत है, उसे कुछ भी पता नहीं है । और गर्भ के भीतर बच्चा इतना सुनिश्चित इकाई में बँधा हुआ है कि वह अपने को ही जगत मान ले तो कोई आश्चर्य नहीं है । क्योंकि न उसे खाने के लिए आयोजन करना पड़ता है, न उसे पीने के लिए आयोजन करना पड़ता है, न उसे आत्मरक्षा के लिए आयोजन करना पड़ता है - उसे कुछ करना ही नहीं पड़ता है, वह सिर्फ होता है । और परिपूर्ण होता है । उसको कहीं कोई कमी नहीं होती । उसे खयाल भी नहीं आ सकता कि मुझसे अलग भी कुछ है । लेकिन गर्भ के बाहर आएगा, अपनी सीमाओं को तोड़ेगा तो जगत का प्रारंभ होगा ।
इसलिए वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे का जन्म जो है, बहुत 'ट्रामेटिक' है, उसे बड़ा धक्का लगता है । एकदम एक सीमा में बँधा हुआ अस्तित्व था, एकदम से टूट जाता है और एक असीम जगत में खड़ा हो जाता है जहाँ कुछ भी सूझता नहीं है । पहली बार पता चलता है, मैं ही नहीं हूँ और भी बहुत कुछ है । मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह धक्का इतना गहरा है कि जिंदगी भर इस धक्के से आदमी संभल नहीं पाता है । और मनोवैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं - इसमें सच्चाई भी दिखती है - कि आदमी जो शांति की खोज करता है, आनंद की खोज करता है, स्वतंत्रता की खोज करता है, आत्मा की खोज करता है, परमात्मा की खोज करता है, यह अपने गर्भ के अनुभव के कारण करता है । क्योंकि गर्भ में वह परम स्वतंत्र था, परम आनंदित था, परम शांत था, कोई तनाव न था, कोई सीमा न थी, जीवन पूरा का पूरा उपलब्ध था, उसमें कहीं कोई बाधा न थी; कोई जिम्मेवारी न थी, कोई बोझ न था, कोई चिंता न थी ।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह जो मोक्ष की खोज है, उस गर्भ में अनुभव हुई शांति के ही कारण है । क्योंकि वह गहरा अनुभव है और फिर उसके बाद जगत का गहरा धक्का है ।
मोक्ष की जो हमारी धारणा है, वह विराट गर्भ की है । उसे हमने हिरण्यमय गर्भ कहा भी है - 'द वूंब ऑफ द डिवाइन' । वह जो परमात्मा का गर्भ है, उसमें मैं ऐसे लीन हो जाऊँ जैसे माँ के गर्भ में था । न कोई चिंता, न कोई पीड़ा, न पराये का पता । लेकिन बच्चा बाहर आता है तो उसे जगत दिखाई पड़ता है ।
बीज टूटता है, अंकुरित होता है तो उसे सूरज के दर्शन होते हैं । जहाँ तक हमारी स्थिति है, जैसे हम हैं, अभी हम अहंकार की खोल में बंद हैं । उसके पार हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता । मैं-ही-मैं दिखायी पड़ता हूँ । अगर कभी थोड़ी बहुत झलक किसी की मिलती भी है तो वह भी 'मेरे' होने के कारण मिलती है । 'मेरा' मित्र है, 'मेरा' भाई है, 'मेरी' पत्नी है, 'मेरा' पति है । तो 'मेरे' से कहीं थोड़ा-सा संबंध जुड़ता है तो थोड़ी-सी झलक मुझे मिलती है । बस यही मेरा जगत है । इसके पार जो विराट फैला हुआ है, उसका मुझे कोई पता नहीं है । धर्म एक पुनर्जन्म है, एक 'रिबर्थ' । एक और गर्भ को तोड़ना है । यह अहंकार को भी तोड़ देना है । लेकिन यह अहंकार तभी टूटे, जब मेरे खंडों का जो जोड़ है उसके पार मुझमें कोई अंकुरण शुरू हो जाए । कुछ भिन्न मेरे भीतर जागने लगे, मेरे जोड़ से ज्यादा । जिस दिन खंडों के बीच अखंड की प्रतीति शुरू होती है, उसी दिन ब्रह्म की यात्रा पर हम निकलते हैं ।
भौतिकविद के लिए अणु हैं, परमाणु हैं, इलेक्ट्रॉन हैं - और इन सब से मिलकर पदार्थ बना है । ठीक ऐसे ही चैतन्य के भी कण हैं, जीवकोश हैं - जिनसे मिल कर जीवन बना है । इस विराट जीवन को खंड-खंड में देखना ही विज्ञान है, इसको अखंड देख पाना धर्म है ।
वैज्ञानिक कहेगा कि जीवकोश रासायनिक पदार्थों का जोड़ है और व्यक्ति की आत्मा इन जीवकोशों का जोड़ है । धर्म इसकी ठीक विपरीत मान्यता है । धर्म कहता है, खंड का जोड़ नहीं है अखंड । खंड अखंड का भाव है । अखंड खंडों का जोड़ नहीं है । खंड अखंड का भाग है । खंडों के जोड़ से अखंड नहीं बनता, अखंड अपनी हैसियत से है । वह कोई गणितीय जोड़ नहीं है, सावयव एकता है । अखंड अपनी हैसियत से है, खंडों को उसका पता नहीं है । क्योंकि खंड को अखंड का पता इसलिए नहीं होता कि खंड अपने भीतर ही बंधकर जीता है । उसे पता नहीं है । जब खंड अपने से बाहर निकलता है, अपने से ऊपर उठता है, जागकर अपने से पार देखता है, तब उसे अखंड की प्रतीति शुरू होती है ।
इसे ऐसे समझें कि माँ के पेट में एक बच्चा है गर्भ में, उसे इस जगत का कोई पता नहीं है । क्यों पता नहीं है ? क्योंकि माँ के पेट में जो बच्चा है, वह अपनी ही हैसियत से एक इकाई है । और उसका जगत से कोई सीधा संबंध नहीं है । उसे पता भी नहीं है कि सूरज निकलता है, चाँद-तारे हैं; उसे पता भी नहीं है कि लोग हैं, विराट जगत है, उसे कुछ भी पता नहीं है । और गर्भ के भीतर बच्चा इतना सुनिश्चित इकाई में बँधा हुआ है कि वह अपने को ही जगत मान ले तो कोई आश्चर्य नहीं है । क्योंकि न उसे खाने के लिए आयोजन करना पड़ता है, न उसे पीने के लिए आयोजन करना पड़ता है, न उसे आत्मरक्षा के लिए आयोजन करना पड़ता है - उसे कुछ करना ही नहीं पड़ता है, वह सिर्फ होता है । और परिपूर्ण होता है । उसको कहीं कोई कमी नहीं होती । उसे खयाल भी नहीं आ सकता कि मुझसे अलग भी कुछ है । लेकिन गर्भ के बाहर आएगा, अपनी सीमाओं को तोड़ेगा तो जगत का प्रारंभ होगा ।
इसलिए वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे का जन्म जो है, बहुत 'ट्रामेटिक' है, उसे बड़ा धक्का लगता है । एकदम एक सीमा में बँधा हुआ अस्तित्व था, एकदम से टूट जाता है और एक असीम जगत में खड़ा हो जाता है जहाँ कुछ भी सूझता नहीं है । पहली बार पता चलता है, मैं ही नहीं हूँ और भी बहुत कुछ है । मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह धक्का इतना गहरा है कि जिंदगी भर इस धक्के से आदमी संभल नहीं पाता है । और मनोवैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं - इसमें सच्चाई भी दिखती है - कि आदमी जो शांति की खोज करता है, आनंद की खोज करता है, स्वतंत्रता की खोज करता है, आत्मा की खोज करता है, परमात्मा की खोज करता है, यह अपने गर्भ के अनुभव के कारण करता है । क्योंकि गर्भ में वह परम स्वतंत्र था, परम आनंदित था, परम शांत था, कोई तनाव न था, कोई सीमा न थी, जीवन पूरा का पूरा उपलब्ध था, उसमें कहीं कोई बाधा न थी; कोई जिम्मेवारी न थी, कोई बोझ न था, कोई चिंता न थी ।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह जो मोक्ष की खोज है, उस गर्भ में अनुभव हुई शांति के ही कारण है । क्योंकि वह गहरा अनुभव है और फिर उसके बाद जगत का गहरा धक्का है ।
मोक्ष की जो हमारी धारणा है, वह विराट गर्भ की है । उसे हमने हिरण्यमय गर्भ कहा भी है - 'द वूंब ऑफ द डिवाइन' । वह जो परमात्मा का गर्भ है, उसमें मैं ऐसे लीन हो जाऊँ जैसे माँ के गर्भ में था । न कोई चिंता, न कोई पीड़ा, न पराये का पता । लेकिन बच्चा बाहर आता है तो उसे जगत दिखाई पड़ता है ।
बीज टूटता है, अंकुरित होता है तो उसे सूरज के दर्शन होते हैं । जहाँ तक हमारी स्थिति है, जैसे हम हैं, अभी हम अहंकार की खोल में बंद हैं । उसके पार हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता । मैं-ही-मैं दिखायी पड़ता हूँ । अगर कभी थोड़ी बहुत झलक किसी की मिलती भी है तो वह भी 'मेरे' होने के कारण मिलती है । 'मेरा' मित्र है, 'मेरा' भाई है, 'मेरी' पत्नी है, 'मेरा' पति है । तो 'मेरे' से कहीं थोड़ा-सा संबंध जुड़ता है तो थोड़ी-सी झलक मुझे मिलती है । बस यही मेरा जगत है । इसके पार जो विराट फैला हुआ है, उसका मुझे कोई पता नहीं है । धर्म एक पुनर्जन्म है, एक 'रिबर्थ' । एक और गर्भ को तोड़ना है । यह अहंकार को भी तोड़ देना है । लेकिन यह अहंकार तभी टूटे, जब मेरे खंडों का जो जोड़ है उसके पार मुझमें कोई अंकुरण शुरू हो जाए । कुछ भिन्न मेरे भीतर जागने लगे, मेरे जोड़ से ज्यादा । जिस दिन खंडों के बीच अखंड की प्रतीति शुरू होती है, उसी दिन ब्रह्म की यात्रा पर हम निकलते हैं ।

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