'धर्म क्या है ?
धर्म प्रेम की अंतिम पराकाष्ठा है । प्रेम जैसे फूल है, धर्म प्रेम के फूल की सुवास है । काम है बीज; प्रेम है फूल; धर्म है फूल से उड़ गई सुगंध । इसलिए धर्म अदृश्य है ।
दृश्य तो होते हैं बुद्ध, कृष्ण, कबीर, नानक । ये फूल हैं । इनके आस-पास सुगंध की तरह जो व्याप्त होता है, वह धर्म है । जो बुद्धि से सोचने चलते हैं, उन्हें वह दिखाई नहीं पड़ता । वह दिखाई पड़ने वाली बात नहीं, मुट्ठी में आ जाए ऐसा तथ्य नहीं, शब्दों में समा जाए ऐसा अनुभव नहीं । लेकिन जो हृदय को खोल देते हैं - किसी सदगुरु के समक्ष, किसी सत्संग में - वे जान पाते हैं कि धर्म क्या है ?
हमारी समस्या यह है कि हम बुद्धि के आदि हो गए हैं, इसलिए प्रेम से परिचय बनाना हमारे लिए मुश्किल हो गया है । बुद्धि ज्यादा से ज्यादा काम से संबंध बना पाती है । काम एक शारीरिक जरूरत है । काम बहुत स्थूल है; स्थूल देह को उस पोषण की जरूरत है । लेकिन प्रेम बहुत सूक्ष्म है । और धर्म तो आत्यंतिक है । जब तुम्हारे भीतर परमात्मा जगता है, तो तुम्हारे आसपास जो आभा विकीर्णित होती है, उसका नाम धर्म है ।
धर्म का अर्थ हिंदू नहीं, मुसलमान नहीं, ईसाई नहीं, जैन नहीं, सिक्ख नहीं । नानक के पास जो गंध थी, उसका नाम धर्म है । सिक्ख - धर्म नहीं है । वह तो सिर्फ उस गंध के संबंध में है । महावीर के पास जो गंध अनुभव की गई थी, वह धर्म थी । जैन धर्म - धर्म नहीं है । महावीर के पास जो गंध थी, वह जिनत्व की थी । जैन धर्म तो पंडितों द्धारा निर्धारित सिद्धांत, शास्त्र में आबद्ध व्याख्या है ।
जैसे तुमने फूल सूंघा और फिर किसी को तुम बताने लगे कि कैसी गंध थी । क्या बताओगे ? फूल की गंध का किन शब्दों में वर्णन करोगे ? समुद्र की उत्ताल तरंगों का, हवाओं की ताजगी का कैसे वर्णन करोगे ?
धर्म प्रेम की अंतिम पराकाष्ठा है । प्रेम जैसे फूल है, धर्म प्रेम के फूल की सुवास है । काम है बीज; प्रेम है फूल; धर्म है फूल से उड़ गई सुगंध । इसलिए धर्म अदृश्य है ।
दृश्य तो होते हैं बुद्ध, कृष्ण, कबीर, नानक । ये फूल हैं । इनके आस-पास सुगंध की तरह जो व्याप्त होता है, वह धर्म है । जो बुद्धि से सोचने चलते हैं, उन्हें वह दिखाई नहीं पड़ता । वह दिखाई पड़ने वाली बात नहीं, मुट्ठी में आ जाए ऐसा तथ्य नहीं, शब्दों में समा जाए ऐसा अनुभव नहीं । लेकिन जो हृदय को खोल देते हैं - किसी सदगुरु के समक्ष, किसी सत्संग में - वे जान पाते हैं कि धर्म क्या है ?
हमारी समस्या यह है कि हम बुद्धि के आदि हो गए हैं, इसलिए प्रेम से परिचय बनाना हमारे लिए मुश्किल हो गया है । बुद्धि ज्यादा से ज्यादा काम से संबंध बना पाती है । काम एक शारीरिक जरूरत है । काम बहुत स्थूल है; स्थूल देह को उस पोषण की जरूरत है । लेकिन प्रेम बहुत सूक्ष्म है । और धर्म तो आत्यंतिक है । जब तुम्हारे भीतर परमात्मा जगता है, तो तुम्हारे आसपास जो आभा विकीर्णित होती है, उसका नाम धर्म है ।
धर्म का अर्थ हिंदू नहीं, मुसलमान नहीं, ईसाई नहीं, जैन नहीं, सिक्ख नहीं । नानक के पास जो गंध थी, उसका नाम धर्म है । सिक्ख - धर्म नहीं है । वह तो सिर्फ उस गंध के संबंध में है । महावीर के पास जो गंध अनुभव की गई थी, वह धर्म थी । जैन धर्म - धर्म नहीं है । महावीर के पास जो गंध थी, वह जिनत्व की थी । जैन धर्म तो पंडितों द्धारा निर्धारित सिद्धांत, शास्त्र में आबद्ध व्याख्या है ।
जैसे तुमने फूल सूंघा और फिर किसी को तुम बताने लगे कि कैसी गंध थी । क्या बताओगे ? फूल की गंध का किन शब्दों में वर्णन करोगे ? समुद्र की उत्ताल तरंगों का, हवाओं की ताजगी का कैसे वर्णन करोगे ?
धर्म
तो कभी-कभी अवतरित होता है - जिसने सत्य को जाना हो, उसके सान्निध्य में;
जिसने सत्य को अनुभव किया हो, उसके पास बैठ जाने में, उसकी निकटता में ।
धर्म सत्संग की अनुभूति है ।
नानक के पास बैठने का; बुद्ध के पास संगत करने का जिन लोगों को मौका मिला होगा उन्होंने धर्म को अनुभव किया होगा । उन्होंने बाद के लोगों के लिए अपने अनुभवों को शब्दों में आबद्ध किया, शास्त्र बनाए - किंतु उन शास्त्रों में कागजों की गंध आती है, स्याही की गंध आती है; बुद्ध की नहीं । नानक की, महावीर की, कृष्ण की गंध को किताब में कैसे पकड़ा जा सकता है ?
सदगुरु के प्रेम में जो स्वाद आता है, उसका नाम धर्म है ।
जिस क्षण बुद्ध के पास सारिपुत्र झुका, वहाँ था धर्म । जिस क्षण मोहम्मद के पास अली बैठा, वहाँ था धर्म । जिस क्षण जुन्नैद के चरणों में मंसूर ने सिर रखा, वहाँ था धर्म ।
जिस क्षण जीसस ने एक सुबह झील पर मछली मारते हुए एक युवक के कंधे पर हाथ रखा, युवक ने पलट कर देखा और जीसस ने कहा - कब तक मछलियाँ मारते रहोगे ? मैं आ चुका हूँ । मेरे पीछे आओ ! कब तक मछलियों पर जाल फेंकते रहोगे ? मैं तुम्हें लोगों की आत्माओं को फँसाना सिखाऊँ । और उस युवक ने जाल फेंक दिया, और वह जीसस के पीछे हो लिया । उस घड़ी था धर्म । धर्म चर्चों में नहीं है, वेटिकन में नहीं है, पोपों-पादरियों में नहीं है ।
वे नगर के बाहर पहुँचे ही थे कि एक आदमी ने भाग कर खबर दी उस युवक को कि तू कहाँ जा रहा है ? तेरे पिता की मृत्यु हो गई है । घर वापस चल ।
उस युवक ने जीसस से कहा, क्षमा करें । मुझे तीन दिन की आज्ञा दे दें, मैं जाकर पिता का अंतिम संस्कार कर आऊँ ।
जीसस ने कहा, तू फिक्र छोड़ । गाँव में मुर्दे बहुत हैं, वे मुर्दे की फिक्र कर लेंगे । तू मेरे पीछे आ । इस रास्ते पर जो चलता है वह पीछे नहीं लौटता है ।
और अद्भुत रहा होगा वह युवक ! ऐसी अद्भुतता का नाम ही शिष्यत्व है । उसने उस आदमी से कहा, क्षमा करना । घर के लोगों को कहना - माफ़ कर देना । मैं एक नए जादु में बंध गया हूँ, एक नए तिलिस्म में । मैं तो जाता हूँ । और पिता तो जा ही चुके हैं; देह पड़ी रह गई है । गाँव के लोग ही ठिकाने लगा देंगे । इसके पहले कि मेरी देह भी जाए, मुझे उसे खोज लेने दो, जो देह में बसा है और अपरिचित है ।
वह जीसस के पीछे ही हो लिया । जीसस के प्रति उसका यह अद्भुत प्रेम अनायास ही घटा, आकस्मिक और क्षण में घटा । बिना किसी पूर्व-आयोजन के । जीसस ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कुछ बात हो गई ।
शिष्यत्व घटता है । यह कोई ढूँढ़ने का रास्ता नहीं है । न भाषा उसे ढूँढ सकती है, न विज्ञान, न दर्शन । उसे खोजने/पाने का रास्ता तो प्रेम है ।
हाँ, कभी-कभी संगीत में उसकी झलक आ जाती है, क्योंकि संगीत में प्रेम की थोड़ी गंध उठ सकती है । कभी-कभी काव्य में उसकी भनक पड़ती है, क्योंकि काव्य उसके प्रतिफलन को पकड़ लेता है । कभी-कभी प्रकृति के सौंदर्य को देख कर तुम्हें परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव होता है । बहुत सचेतन रूप से न भी होता हो - आभास भर होता हो, धुँधला-धुंधला, धुंध से भरा । वह मनुष्य बहुत अभागा है जिसने सुबह सूरज को उगते देखा, लेकिन जिसके भीतर कुछ भी न उगा । जिसने पूर्णिमा का चाँद देखा, किंतु पूर्णिमा के चाँद में उसे अपने पूर्ण होने की संभावना का कोई दर्शन न हुआ ! वह मनुष्य निश्चय ही बदकिस्मत है, जिसने फूल खिलते देखे और जिसे याद न आया कि मेरा फूल कब खिलेगा !
धर्म इन सबकी याददाश्त है । इन सारे स्मरणों का नाम है । धर्म सुरति है, स्मृति है, पुनः स्मृति है । इस बात का बोध कि मैं कौन हूँ । इस बात का बोध कि यह अस्तित्व क्या है ?'
नानक के पास बैठने का; बुद्ध के पास संगत करने का जिन लोगों को मौका मिला होगा उन्होंने धर्म को अनुभव किया होगा । उन्होंने बाद के लोगों के लिए अपने अनुभवों को शब्दों में आबद्ध किया, शास्त्र बनाए - किंतु उन शास्त्रों में कागजों की गंध आती है, स्याही की गंध आती है; बुद्ध की नहीं । नानक की, महावीर की, कृष्ण की गंध को किताब में कैसे पकड़ा जा सकता है ?
सदगुरु के प्रेम में जो स्वाद आता है, उसका नाम धर्म है ।
जिस क्षण बुद्ध के पास सारिपुत्र झुका, वहाँ था धर्म । जिस क्षण मोहम्मद के पास अली बैठा, वहाँ था धर्म । जिस क्षण जुन्नैद के चरणों में मंसूर ने सिर रखा, वहाँ था धर्म ।
जिस क्षण जीसस ने एक सुबह झील पर मछली मारते हुए एक युवक के कंधे पर हाथ रखा, युवक ने पलट कर देखा और जीसस ने कहा - कब तक मछलियाँ मारते रहोगे ? मैं आ चुका हूँ । मेरे पीछे आओ ! कब तक मछलियों पर जाल फेंकते रहोगे ? मैं तुम्हें लोगों की आत्माओं को फँसाना सिखाऊँ । और उस युवक ने जाल फेंक दिया, और वह जीसस के पीछे हो लिया । उस घड़ी था धर्म । धर्म चर्चों में नहीं है, वेटिकन में नहीं है, पोपों-पादरियों में नहीं है ।
वे नगर के बाहर पहुँचे ही थे कि एक आदमी ने भाग कर खबर दी उस युवक को कि तू कहाँ जा रहा है ? तेरे पिता की मृत्यु हो गई है । घर वापस चल ।
उस युवक ने जीसस से कहा, क्षमा करें । मुझे तीन दिन की आज्ञा दे दें, मैं जाकर पिता का अंतिम संस्कार कर आऊँ ।
जीसस ने कहा, तू फिक्र छोड़ । गाँव में मुर्दे बहुत हैं, वे मुर्दे की फिक्र कर लेंगे । तू मेरे पीछे आ । इस रास्ते पर जो चलता है वह पीछे नहीं लौटता है ।
और अद्भुत रहा होगा वह युवक ! ऐसी अद्भुतता का नाम ही शिष्यत्व है । उसने उस आदमी से कहा, क्षमा करना । घर के लोगों को कहना - माफ़ कर देना । मैं एक नए जादु में बंध गया हूँ, एक नए तिलिस्म में । मैं तो जाता हूँ । और पिता तो जा ही चुके हैं; देह पड़ी रह गई है । गाँव के लोग ही ठिकाने लगा देंगे । इसके पहले कि मेरी देह भी जाए, मुझे उसे खोज लेने दो, जो देह में बसा है और अपरिचित है ।
वह जीसस के पीछे ही हो लिया । जीसस के प्रति उसका यह अद्भुत प्रेम अनायास ही घटा, आकस्मिक और क्षण में घटा । बिना किसी पूर्व-आयोजन के । जीसस ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कुछ बात हो गई ।
शिष्यत्व घटता है । यह कोई ढूँढ़ने का रास्ता नहीं है । न भाषा उसे ढूँढ सकती है, न विज्ञान, न दर्शन । उसे खोजने/पाने का रास्ता तो प्रेम है ।
हाँ, कभी-कभी संगीत में उसकी झलक आ जाती है, क्योंकि संगीत में प्रेम की थोड़ी गंध उठ सकती है । कभी-कभी काव्य में उसकी भनक पड़ती है, क्योंकि काव्य उसके प्रतिफलन को पकड़ लेता है । कभी-कभी प्रकृति के सौंदर्य को देख कर तुम्हें परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव होता है । बहुत सचेतन रूप से न भी होता हो - आभास भर होता हो, धुँधला-धुंधला, धुंध से भरा । वह मनुष्य बहुत अभागा है जिसने सुबह सूरज को उगते देखा, लेकिन जिसके भीतर कुछ भी न उगा । जिसने पूर्णिमा का चाँद देखा, किंतु पूर्णिमा के चाँद में उसे अपने पूर्ण होने की संभावना का कोई दर्शन न हुआ ! वह मनुष्य निश्चय ही बदकिस्मत है, जिसने फूल खिलते देखे और जिसे याद न आया कि मेरा फूल कब खिलेगा !
धर्म इन सबकी याददाश्त है । इन सारे स्मरणों का नाम है । धर्म सुरति है, स्मृति है, पुनः स्मृति है । इस बात का बोध कि मैं कौन हूँ । इस बात का बोध कि यह अस्तित्व क्या है ?'

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