पूरी मनुष्य जाति के
इतिहास में 'ओम' एक ऐसा शब्द है जिसे लेकर दुनिया के छह महत्वपूर्ण धर्म
राजी हैं - जो स्वीकार करते हैं कि इसमें कुछ है । साधना के तीन बड़े भारतीय
स्वर हैं - जैन, बौद्ध, हिंदू । तीनों में बहुत मौलिक सैद्धांतिक विवाद हैं, उनमें कहीं कोई तालमेल दिखाई नहीं पड़ता । लेकिन ओम शब्द को लेकर तीनों एकमत हैं ।
भारत के बाहर जो तीन बड़े धर्म हैं - यहूदी, इस्लाम और ईसाइयत; ओम के संबंध
में उनके बीच भी कोई विवाद नहीं है । हालाँकि वह उसे 'अमीन' कहते हैं । भाषाशास्त्री
कहते हैं कि 'ओम' और 'अमीन' एक ही चीज हैं, उनमें कोई फर्क नहीं हैं;
उच्चारण में जो फर्क है वह भाषा में उस ध्वनि को पकड़ने के फर्क के कारण आया
है ।
'ओम' शब्द में क्या है ?
इसे हम दो-तीन प्रकार से समझें ! एक, मनुष्य का मन जो है वह शब्दों का समूह है । मन में शब्दों के सिवाए और है क्या ? अगर सारे शब्द निकाल लें, तो मन ही नहीं बचेगा । मन करीब-करीब ऐसा है जैसे कि प्याज होता है - सब छिलके बाहर निकाल लें तो प्याज में कुछ बचता ही नहीं । ऐसा ही मन है । शब्दों के छिलके । सब शब्द बाहर निकाल लें तो पीछे क्या बचेगा ? शून्य ही बचेगा । सोचें थोड़ा आप कि आपके पास कोई शब्द न बचे, तो आपके पास कौन-सा मन बचेगा ? क्या बचेगा ? जाहिर है कि मन सिर्फ शब्दों का समूह है ।
मजे की बात यह है कि इसी मन से हम सब कुछ कर रहे हैं । बुरा या भला, दुःख या सुख, संसार या मोक्ष - जो भी हम कर रहे हैं इस मन से ही कर रहे हैं ।
ओम एक शब्द है - उसे शब्द कहना भी ठीक नहीं है, वह एक ध्वनि है क्योंकि उसका कोई अर्थ नहीं है । शब्द उस ध्वनि को कहते हैं जिसमें कुछ अर्थ हो - ओम एक ऐसा शब्द है जिसका कोई अर्थ नहीं है, उसमें सिर्फ ध्वनि है । लेकिन उस ध्वनि में समस्त मूल ध्वनियों का सार है । अ, उ, म - यह तीन मूल ध्वनियाँ हैं । यहाँ इस बात पर गौर करना प्रासंगिक होगा कि भारतीय मनीषा को तीन का बड़ा बोध है : ब्रह्मा, विष्णु, महेश - जीवन के तीन अंग हैं; इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, पॉजिट्रॉन - फिजिक्स की दृष्टि में पदार्थ के तीन आधार हैं; ऐसे ही भारतीय मनीषा की दृष्टि में अ, उ, म - समस्त भाषा, समस्त वाणी, समस्त शब्दों के तीन आधार हैं । सब ध्वनियाँ इन तीन ध्वनियों के जोड़ हैं । तो मौलिक तीन ध्वनियाँ ओम में हैं । हम ऐसा कह सकते हैं कि ओम जो है, ध्वनि की दृष्टि से एटम है । ध्वनि की दृष्टि से अणु है । इलेक्ट्रॉन, पॉजीट्रॉन, न्यूट्रॉन जैसे तीन विद्युत कणों से मिलकर परमाणु निर्मित होता है - पदार्थ का । अ, उ, म - से निर्मित होकर जो परमाणु बनता है, वह है मन का ।
ओम मन का परमाणु है और सूक्ष्मतम परमाणु है । इससे सूक्ष्म कोई परमाणु नहीं हो सकता । इसको हम तोड़ दें - जैसा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर हम इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और पॉजीट्रॉन को तोड़ दें तो फिर हमारे हाथ से परमाणु खो जाता है शून्य में, फिर पीछे कुछ मिलता नहीं, फिर पीछे कुछ पकड़ में नहीं आता, सब निराकार हो जाता है । लेकिन उसके टूटते ही विराट ऊर्जा पैदा होती है, जिसको हम अणु-विस्फोट कहते हैं । वह अणु-विस्फोट इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और पॉजीट्रॉन इन तीनों के अलग हो जाने से, इन तीनों के बीच जो ऊर्जा छिपी थी, जो अनंत शक्ति छिपी थी, इन तीनों के हटते ही 'रिलीज' होती है, छूटती है । एक परमाणु बम हमने गिरा कर देखा हिरोशिमा पर । पाँच मिनट के भीतर एक लाख बीस हजार व्यक्ति राख हो गए । एक छोटा-सा परमाणु - जो आँख से दिखाई नहीं पड़ता - उसका विस्फोट है । उन तीनों के जुड़े रहने से उतनी शक्ति उसके भीतर छिपी है । छूटते ही इतनी शक्ति बाहर विसर्जित होती है ।
ठीक भारतीय मेधा ने भी - क्योंकि भारतीय मेधा ने पदार्थ पर बहुत मेहनत नहीं की; क्योंकि उसे लगा कि पदार्थ की मेहनत कहीं नहीं ले जाती; पदार्थ पर मेहनत करके भी देख ली तो भी व्यक्ति को कुछ उपलब्ध नहीं होता; सिर्फ वहम होता है कि मिल रहा है, मिल रहा है और हाथ खाली रह जाते हैं - तो भारतीय मेधा ने पदार्थ पर मेहनत छोड़कर मन पर मेहनत शुरू की । क्योंकि जिस मन को ही सुख-दुःख होते हैं, उसे ही क्यों न बदल डालें । जिन वस्तुओं से सुख-दुःख होते हैं उन्हें इकठ्ठा करने के बजाये, जिस मन को सुख-दुःख होते हैं उसे ही क्यों न बदल डालें - यह भारतीय दृष्टि निर्मित हुई । यह बहुत अनुभव से हुई ।
उन सब चीजों को इकठ्ठा कर लिया जिनसे सुख मिलता है, फिर भी पाया कि इकट्ठे होते ही उनसे सुख नहीं मिलता । जिनसे दुःख मिलता है उनको अलग करके भी देख लिया, उनके अलग हटने पर दुःख किसी और से मिलना शुरू हो जाता है - लेकिन समाप्त नहीं होता । अंततः पाया कि वस्तुओं से सुख-दुःख का कोई सीधा संबंध नहीं है । सुख और दुःख के लिए वस्तुएँ सिर्फ खूँटियों का काम करती हैं । हम घर आते हैं, खूँटी पर कोट टाँग देते हैं । अगर खूँटी न मिली तो दरवाजे पर टाँग देते हैं । दरवाजा न मिला तो खिड़की पर टाँग देते हैं । कोट कहीं न कहीं टंगता ही है, खूँटी से बहुत प्रयोजन नहीं है । इसलिए खूँटी तोड़ दो, या उसे बड़ी कर लो - कुछ फर्क नहीं पड़ता, कोट टंग ही जाता है ।
भारतीय मन ने जाना कि वस्तुएँ केवल खूँटियों का काम करती हैं और मन उन पर टंगता है, कोट की तरह । अब अगर मन में दुःख है तो हर खूँटी पर वह दुखी ही रहता है; मन लेकिन यदि सुख में है तो वह हर खूँटी पर सुखी ही रहता है । मन शांत है तो हर खूँटी पर वह शांत ही रहता है । मन लेकिन यदि अशांत है तो कोई भी खूँटी उसे शांत नहीं कर पाती है । इसलिए जरूरत खूँटियों को बदलने की नहीं है, मन को बदलने की है । इस तरह मन की खोज शुरू हुई - और मन की खोज में जो विश्लेषण हाथ लगा, उसमें पाया गया कि ओम जो है, वह मन का परमाणु है । क्या इस परमाणु का भी विस्फोट हो सकता है ? अगर हो सके, तो इस परमाणु से भी ऊर्जा पैदा होगी । क्या इस परमाणु का भी 'एक्सप्लोजन' हो सकता है ? योग कहता है कि हो सकता है । इसका अगर विसर्जन हो जाये, अगर यह टूट जाये तो भीतर ऊर्जा पैदा होगी । भीतर अग्नि पैदा होगी । वही अग्नि व्यक्ति के अहंकार को, उसके कर्मों को, उसके पापों को, उसके पुण्यों को, उसने जो भी किया है उस सबको, उसके अतीत को, उसके समस्त बोझ को, उसके समस्त भार को राख कर देगी ।
ओम का जो विस्फोट है - वह व्यक्ति के भीतर जो कुछ भी व्यर्थ है, सबको जला देता है । उसके बाद व्यक्ति वही नहीं रह जाता, जो वह था । संसार के तमाम बंधनों से वह मुक्त हो जाता है । वह दूसरा ही हो जाता है । उसका दूसरा ही जन्म होता है । दरअसल हमारे भीतर अस्तित्व ने वह कुँजी रख दी है, जिसका हम कभी भी उपयोग करें तो मुक्त हो सकते हैं । न उपयोग करें, तो यह हमारी ही जिम्मेवारी है ।
'ओम' शब्द में क्या है ?
इसे हम दो-तीन प्रकार से समझें ! एक, मनुष्य का मन जो है वह शब्दों का समूह है । मन में शब्दों के सिवाए और है क्या ? अगर सारे शब्द निकाल लें, तो मन ही नहीं बचेगा । मन करीब-करीब ऐसा है जैसे कि प्याज होता है - सब छिलके बाहर निकाल लें तो प्याज में कुछ बचता ही नहीं । ऐसा ही मन है । शब्दों के छिलके । सब शब्द बाहर निकाल लें तो पीछे क्या बचेगा ? शून्य ही बचेगा । सोचें थोड़ा आप कि आपके पास कोई शब्द न बचे, तो आपके पास कौन-सा मन बचेगा ? क्या बचेगा ? जाहिर है कि मन सिर्फ शब्दों का समूह है ।
मजे की बात यह है कि इसी मन से हम सब कुछ कर रहे हैं । बुरा या भला, दुःख या सुख, संसार या मोक्ष - जो भी हम कर रहे हैं इस मन से ही कर रहे हैं ।
ओम एक शब्द है - उसे शब्द कहना भी ठीक नहीं है, वह एक ध्वनि है क्योंकि उसका कोई अर्थ नहीं है । शब्द उस ध्वनि को कहते हैं जिसमें कुछ अर्थ हो - ओम एक ऐसा शब्द है जिसका कोई अर्थ नहीं है, उसमें सिर्फ ध्वनि है । लेकिन उस ध्वनि में समस्त मूल ध्वनियों का सार है । अ, उ, म - यह तीन मूल ध्वनियाँ हैं । यहाँ इस बात पर गौर करना प्रासंगिक होगा कि भारतीय मनीषा को तीन का बड़ा बोध है : ब्रह्मा, विष्णु, महेश - जीवन के तीन अंग हैं; इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, पॉजिट्रॉन - फिजिक्स की दृष्टि में पदार्थ के तीन आधार हैं; ऐसे ही भारतीय मनीषा की दृष्टि में अ, उ, म - समस्त भाषा, समस्त वाणी, समस्त शब्दों के तीन आधार हैं । सब ध्वनियाँ इन तीन ध्वनियों के जोड़ हैं । तो मौलिक तीन ध्वनियाँ ओम में हैं । हम ऐसा कह सकते हैं कि ओम जो है, ध्वनि की दृष्टि से एटम है । ध्वनि की दृष्टि से अणु है । इलेक्ट्रॉन, पॉजीट्रॉन, न्यूट्रॉन जैसे तीन विद्युत कणों से मिलकर परमाणु निर्मित होता है - पदार्थ का । अ, उ, म - से निर्मित होकर जो परमाणु बनता है, वह है मन का ।
ओम मन का परमाणु है और सूक्ष्मतम परमाणु है । इससे सूक्ष्म कोई परमाणु नहीं हो सकता । इसको हम तोड़ दें - जैसा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर हम इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और पॉजीट्रॉन को तोड़ दें तो फिर हमारे हाथ से परमाणु खो जाता है शून्य में, फिर पीछे कुछ मिलता नहीं, फिर पीछे कुछ पकड़ में नहीं आता, सब निराकार हो जाता है । लेकिन उसके टूटते ही विराट ऊर्जा पैदा होती है, जिसको हम अणु-विस्फोट कहते हैं । वह अणु-विस्फोट इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और पॉजीट्रॉन इन तीनों के अलग हो जाने से, इन तीनों के बीच जो ऊर्जा छिपी थी, जो अनंत शक्ति छिपी थी, इन तीनों के हटते ही 'रिलीज' होती है, छूटती है । एक परमाणु बम हमने गिरा कर देखा हिरोशिमा पर । पाँच मिनट के भीतर एक लाख बीस हजार व्यक्ति राख हो गए । एक छोटा-सा परमाणु - जो आँख से दिखाई नहीं पड़ता - उसका विस्फोट है । उन तीनों के जुड़े रहने से उतनी शक्ति उसके भीतर छिपी है । छूटते ही इतनी शक्ति बाहर विसर्जित होती है ।
ठीक भारतीय मेधा ने भी - क्योंकि भारतीय मेधा ने पदार्थ पर बहुत मेहनत नहीं की; क्योंकि उसे लगा कि पदार्थ की मेहनत कहीं नहीं ले जाती; पदार्थ पर मेहनत करके भी देख ली तो भी व्यक्ति को कुछ उपलब्ध नहीं होता; सिर्फ वहम होता है कि मिल रहा है, मिल रहा है और हाथ खाली रह जाते हैं - तो भारतीय मेधा ने पदार्थ पर मेहनत छोड़कर मन पर मेहनत शुरू की । क्योंकि जिस मन को ही सुख-दुःख होते हैं, उसे ही क्यों न बदल डालें । जिन वस्तुओं से सुख-दुःख होते हैं उन्हें इकठ्ठा करने के बजाये, जिस मन को सुख-दुःख होते हैं उसे ही क्यों न बदल डालें - यह भारतीय दृष्टि निर्मित हुई । यह बहुत अनुभव से हुई ।
उन सब चीजों को इकठ्ठा कर लिया जिनसे सुख मिलता है, फिर भी पाया कि इकट्ठे होते ही उनसे सुख नहीं मिलता । जिनसे दुःख मिलता है उनको अलग करके भी देख लिया, उनके अलग हटने पर दुःख किसी और से मिलना शुरू हो जाता है - लेकिन समाप्त नहीं होता । अंततः पाया कि वस्तुओं से सुख-दुःख का कोई सीधा संबंध नहीं है । सुख और दुःख के लिए वस्तुएँ सिर्फ खूँटियों का काम करती हैं । हम घर आते हैं, खूँटी पर कोट टाँग देते हैं । अगर खूँटी न मिली तो दरवाजे पर टाँग देते हैं । दरवाजा न मिला तो खिड़की पर टाँग देते हैं । कोट कहीं न कहीं टंगता ही है, खूँटी से बहुत प्रयोजन नहीं है । इसलिए खूँटी तोड़ दो, या उसे बड़ी कर लो - कुछ फर्क नहीं पड़ता, कोट टंग ही जाता है ।
भारतीय मन ने जाना कि वस्तुएँ केवल खूँटियों का काम करती हैं और मन उन पर टंगता है, कोट की तरह । अब अगर मन में दुःख है तो हर खूँटी पर वह दुखी ही रहता है; मन लेकिन यदि सुख में है तो वह हर खूँटी पर सुखी ही रहता है । मन शांत है तो हर खूँटी पर वह शांत ही रहता है । मन लेकिन यदि अशांत है तो कोई भी खूँटी उसे शांत नहीं कर पाती है । इसलिए जरूरत खूँटियों को बदलने की नहीं है, मन को बदलने की है । इस तरह मन की खोज शुरू हुई - और मन की खोज में जो विश्लेषण हाथ लगा, उसमें पाया गया कि ओम जो है, वह मन का परमाणु है । क्या इस परमाणु का भी विस्फोट हो सकता है ? अगर हो सके, तो इस परमाणु से भी ऊर्जा पैदा होगी । क्या इस परमाणु का भी 'एक्सप्लोजन' हो सकता है ? योग कहता है कि हो सकता है । इसका अगर विसर्जन हो जाये, अगर यह टूट जाये तो भीतर ऊर्जा पैदा होगी । भीतर अग्नि पैदा होगी । वही अग्नि व्यक्ति के अहंकार को, उसके कर्मों को, उसके पापों को, उसके पुण्यों को, उसने जो भी किया है उस सबको, उसके अतीत को, उसके समस्त बोझ को, उसके समस्त भार को राख कर देगी ।
ओम का जो विस्फोट है - वह व्यक्ति के भीतर जो कुछ भी व्यर्थ है, सबको जला देता है । उसके बाद व्यक्ति वही नहीं रह जाता, जो वह था । संसार के तमाम बंधनों से वह मुक्त हो जाता है । वह दूसरा ही हो जाता है । उसका दूसरा ही जन्म होता है । दरअसल हमारे भीतर अस्तित्व ने वह कुँजी रख दी है, जिसका हम कभी भी उपयोग करें तो मुक्त हो सकते हैं । न उपयोग करें, तो यह हमारी ही जिम्मेवारी है ।

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