Monday, 28 July 2014

धर्म सत्संग की अनुभूति है : ओशो


'धर्म क्या है ?
धर्म प्रेम की अंतिम पराकाष्ठा है । प्रेम जैसे फूल है, धर्म प्रेम के फूल की सुवास है । काम है बीज; प्रेम है फूल; धर्म है फूल से उड़ गई सुगंध । इसलिए धर्म अदृश्य है ।
दृश्य तो होते हैं बुद्ध, कृष्ण, कबीर, नानक । ये फूल हैं । इनके आस-पास सुगंध की तरह जो व्याप्त होता है, वह धर्म है । जो बुद्धि से सोचने चलते हैं, उन्हें वह दिखाई नहीं पड़ता । वह दिखाई पड़ने वाली बात नहीं, मुट्ठी में आ जाए ऐसा तथ्य नहीं, शब्दों में समा जाए ऐसा अनुभव नहीं । लेकिन जो हृदय को खोल देते हैं - किसी सदगुरु के समक्ष, किसी सत्संग में - वे जान पाते हैं कि धर्म क्या है ?
हमारी समस्या यह है कि हम बुद्धि के आदि हो गए हैं, इसलिए प्रेम से परिचय बनाना हमारे लिए मुश्किल हो गया है । बुद्धि ज्यादा से ज्यादा काम से संबंध बना पाती है । काम एक शारीरिक जरूरत है । काम बहुत स्थूल है; स्थूल देह को उस पोषण की जरूरत है । लेकिन प्रेम बहुत सूक्ष्म है । और धर्म तो आत्यंतिक है । जब तुम्हारे भीतर परमात्मा जगता है, तो तुम्हारे आसपास जो आभा विकीर्णित होती है, उसका नाम धर्म है ।
धर्म का अर्थ हिंदू नहीं, मुसलमान नहीं, ईसाई नहीं, जैन नहीं, सिक्ख नहीं । नानक के पास जो गंध थी, उसका नाम धर्म है । सिक्ख - धर्म नहीं है । वह तो सिर्फ उस गंध के संबंध में है । महावीर के पास जो गंध अनुभव की गई थी, वह धर्म थी । जैन धर्म - धर्म नहीं है । महावीर के पास जो गंध थी, वह जिनत्व की थी । जैन धर्म तो पंडितों द्धारा निर्धारित सिद्धांत, शास्त्र में आबद्ध व्याख्या है ।
जैसे तुमने फूल सूंघा और फिर किसी को तुम बताने लगे कि कैसी गंध थी । क्या बताओगे ? फूल की गंध का किन शब्दों में वर्णन करोगे ? समुद्र की उत्ताल तरंगों का, हवाओं की ताजगी का कैसे वर्णन करोगे ?
धर्म तो कभी-कभी अवतरित होता है - जिसने सत्य को जाना हो, उसके सान्निध्य में; जिसने सत्य को अनुभव किया हो, उसके पास बैठ जाने में, उसकी निकटता में ।
धर्म सत्संग की अनुभूति है ।
नानक के पास बैठने का; बुद्ध के पास संगत करने का जिन लोगों को मौका मिला होगा उन्होंने धर्म को अनुभव किया होगा । उन्होंने बाद के लोगों के लिए अपने अनुभवों को शब्दों में आबद्ध किया, शास्त्र बनाए - किंतु उन शास्त्रों में कागजों की गंध आती है, स्याही की गंध आती है; बुद्ध की नहीं । नानक की, महावीर की, कृष्ण की गंध को किताब में कैसे पकड़ा जा सकता है ?
सदगुरु के प्रेम में जो स्वाद आता है, उसका नाम धर्म है ।
जिस क्षण बुद्ध के पास सारिपुत्र झुका, वहाँ था धर्म । जिस क्षण मोहम्मद के पास अली बैठा, वहाँ था धर्म । जिस क्षण जुन्नैद के चरणों में मंसूर ने सिर रखा, वहाँ था धर्म ।
जिस क्षण जीसस ने एक सुबह झील पर मछली मारते हुए एक युवक के कंधे पर हाथ रखा, युवक ने पलट कर देखा और जीसस ने कहा - कब तक मछलियाँ मारते रहोगे ? मैं आ चुका हूँ । मेरे पीछे आओ ! कब तक मछलियों पर जाल फेंकते रहोगे ? मैं तुम्हें लोगों की आत्माओं को फँसाना सिखाऊँ । और उस युवक ने जाल फेंक दिया, और वह जीसस के पीछे हो लिया । उस घड़ी था धर्म । धर्म चर्चों में नहीं है, वेटिकन में नहीं है, पोपों-पादरियों में नहीं है ।
वे नगर के बाहर पहुँचे ही थे कि एक आदमी ने भाग कर खबर दी उस युवक को कि तू कहाँ जा रहा है ? तेरे पिता की मृत्यु हो गई है । घर वापस चल ।
उस युवक ने जीसस से कहा, क्षमा करें । मुझे तीन दिन की आज्ञा दे दें, मैं जाकर पिता का अंतिम संस्कार कर आऊँ ।
जीसस ने कहा, तू फिक्र छोड़ । गाँव में मुर्दे बहुत हैं, वे मुर्दे की फिक्र कर लेंगे । तू मेरे पीछे आ । इस रास्ते पर जो चलता है वह पीछे नहीं लौटता है ।
और अद्भुत रहा होगा वह युवक ! ऐसी अद्भुतता का नाम ही शिष्यत्व है । उसने उस आदमी से कहा, क्षमा करना । घर के लोगों को कहना - माफ़ कर देना । मैं एक नए जादु में बंध गया हूँ, एक नए तिलिस्म में । मैं तो जाता हूँ । और पिता तो जा ही चुके हैं; देह पड़ी रह गई है । गाँव के लोग ही ठिकाने लगा देंगे । इसके पहले कि मेरी देह भी जाए, मुझे उसे खोज लेने दो, जो देह में बसा है और अपरिचित है ।
वह जीसस के पीछे ही हो लिया । जीसस के प्रति उसका यह अद्भुत प्रेम अनायास ही घटा, आकस्मिक और क्षण में घटा । बिना किसी पूर्व-आयोजन के । जीसस ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कुछ बात हो गई ।
शिष्यत्व घटता है । यह कोई ढूँढ़ने का रास्ता नहीं है । न भाषा उसे ढूँढ सकती है, न विज्ञान, न दर्शन । उसे खोजने/पाने का रास्ता तो प्रेम है ।
हाँ, कभी-कभी संगीत में उसकी झलक आ जाती है, क्योंकि संगीत में प्रेम की थोड़ी गंध उठ सकती है । कभी-कभी काव्य में उसकी भनक पड़ती है, क्योंकि काव्य उसके प्रतिफलन को पकड़ लेता है । कभी-कभी प्रकृति के सौंदर्य को देख कर तुम्हें परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव होता है । बहुत सचेतन रूप से न भी होता हो - आभास भर होता हो, धुँधला-धुंधला, धुंध से भरा । वह मनुष्य बहुत अभागा है जिसने सुबह सूरज को उगते देखा, लेकिन जिसके भीतर कुछ भी न उगा । जिसने पूर्णिमा का चाँद देखा, किंतु पूर्णिमा के चाँद में उसे अपने पूर्ण होने की संभावना का कोई दर्शन न हुआ ! वह मनुष्य निश्चय ही बदकिस्मत है, जिसने फूल खिलते देखे और जिसे याद न आया कि मेरा फूल कब खिलेगा !
धर्म इन सबकी याददाश्त है । इन सारे स्मरणों का नाम है । धर्म सुरति है, स्मृति है, पुनः स्मृति है । इस बात का बोध कि मैं कौन हूँ । इस बात का बोध कि यह अस्तित्व क्या है ?'

Friday, 2 May 2014

'ओम का जो विस्फोट है - वह व्यक्ति के भीतर जो कुछ भी व्यर्थ है, सबको जला देता है; उसके बाद व्यक्ति वही नहीं रह जाता, जो वह था; संसार के तमाम बंधनों से वह मुक्त हो जाता है' : ओशो


पूरी मनुष्य जाति के इतिहास में 'ओम' एक ऐसा शब्द है जिसे लेकर दुनिया के छह महत्वपूर्ण धर्म राजी हैं - जो स्वीकार करते हैं कि इसमें कुछ है । साधना के तीन बड़े भारतीय स्वर हैं - जैन, बौद्ध, हिंदू । तीनों में बहुत मौलिक सैद्धांतिक विवाद हैं, उनमें कहीं कोई तालमेल दिखाई नहीं पड़ता । लेकिन ओम शब्द को लेकर तीनों एकमत हैं । भारत के बाहर जो तीन बड़े धर्म हैं - यहूदी, इस्लाम और ईसाइयत; ओम के संबंध में उनके बीच भी कोई विवाद नहीं है । हालाँकि वह उसे 'अमीन' कहते हैं । भाषाशास्त्री कहते हैं कि 'ओम' और 'अमीन' एक ही चीज हैं, उनमें कोई फर्क नहीं हैं; उच्चारण में जो फर्क है वह भाषा में उस ध्वनि को पकड़ने के फर्क के कारण आया है ।
'ओम' शब्द में क्या है ?
इसे हम दो-तीन प्रकार से समझें ! एक, मनुष्य का मन जो है वह शब्दों का समूह है । मन में शब्दों के सिवाए और है क्या ? अगर सारे शब्द निकाल लें, तो मन ही नहीं बचेगा । मन करीब-करीब ऐसा है जैसे कि प्याज होता है - सब छिलके बाहर निकाल लें तो प्याज में कुछ बचता ही नहीं । ऐसा ही मन है । शब्दों के छिलके । सब शब्द बाहर निकाल लें तो पीछे क्या बचेगा ? शून्य ही बचेगा । सोचें थोड़ा आप कि आपके पास कोई शब्द न बचे, तो आपके पास कौन-सा मन बचेगा ? क्या बचेगा ? जाहिर है कि मन सिर्फ शब्दों का समूह है ।  
मजे की बात यह है कि इसी मन से हम सब कुछ कर रहे हैं । बुरा या भला, दुःख या सुख, संसार या मोक्ष - जो भी हम कर रहे हैं इस मन से ही कर रहे हैं ।
ओम एक शब्द है - उसे शब्द कहना भी ठीक नहीं है, वह एक ध्वनि है क्योंकि उसका कोई अर्थ नहीं है । शब्द उस ध्वनि को कहते हैं जिसमें कुछ अर्थ हो - ओम एक ऐसा शब्द है जिसका कोई अर्थ नहीं है, उसमें सिर्फ ध्वनि है । लेकिन उस ध्वनि में समस्त मूल ध्वनियों का सार है । अ, उ, म - यह तीन मूल ध्वनियाँ हैं । यहाँ इस बात पर गौर करना प्रासंगिक होगा कि भारतीय मनीषा को तीन का बड़ा बोध है : ब्रह्मा, विष्णु, महेश - जीवन के तीन अंग हैं; इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, पॉजिट्रॉन - फिजिक्स की दृष्टि में पदार्थ के तीन आधार हैं; ऐसे ही भारतीय मनीषा की दृष्टि में अ, उ, म - समस्त भाषा, समस्त वाणी, समस्त शब्दों के तीन आधार हैं । सब ध्वनियाँ इन तीन ध्वनियों के जोड़ हैं । तो मौलिक तीन ध्वनियाँ ओम में हैं । हम ऐसा कह सकते हैं कि ओम जो है, ध्वनि की दृष्टि से एटम है । ध्वनि की दृष्टि से अणु है । इलेक्ट्रॉन, पॉजीट्रॉन, न्यूट्रॉन जैसे तीन विद्युत कणों से मिलकर परमाणु निर्मित होता है - पदार्थ का । अ, उ, म - से निर्मित होकर जो परमाणु बनता है, वह है मन का ।
ओम मन का परमाणु है और सूक्ष्मतम परमाणु है । इससे सूक्ष्म कोई परमाणु नहीं हो सकता । इसको हम तोड़ दें - जैसा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर हम इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और पॉजीट्रॉन को तोड़ दें तो फिर हमारे हाथ से परमाणु खो जाता है शून्य में, फिर पीछे कुछ मिलता नहीं, फिर पीछे कुछ पकड़ में नहीं आता, सब निराकार हो जाता है । लेकिन उसके टूटते ही विराट ऊर्जा पैदा होती है, जिसको हम अणु-विस्फोट कहते हैं । वह अणु-विस्फोट इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और पॉजीट्रॉन इन तीनों के अलग हो जाने से, इन तीनों के बीच जो ऊर्जा छिपी थी, जो अनंत शक्ति छिपी थी, इन तीनों के हटते ही 'रिलीज' होती है, छूटती है । एक परमाणु बम हमने गिरा कर देखा हिरोशिमा पर । पाँच मिनट के भीतर एक लाख बीस हजार व्यक्ति राख हो गए । एक छोटा-सा परमाणु - जो आँख से दिखाई नहीं पड़ता - उसका विस्फोट है । उन तीनों के जुड़े रहने से उतनी शक्ति उसके भीतर छिपी है । छूटते ही इतनी शक्ति बाहर विसर्जित होती है ।
ठीक भारतीय मेधा ने भी - क्योंकि भारतीय मेधा ने पदार्थ पर बहुत मेहनत नहीं की; क्योंकि उसे लगा कि पदार्थ की मेहनत कहीं नहीं ले जाती; पदार्थ पर मेहनत करके भी देख ली तो भी व्यक्ति को कुछ उपलब्ध नहीं होता; सिर्फ वहम होता है कि मिल रहा है, मिल रहा है और हाथ खाली रह जाते हैं - तो भारतीय मेधा ने पदार्थ पर मेहनत छोड़कर मन पर मेहनत शुरू की । क्योंकि जिस मन को ही सुख-दुःख होते हैं, उसे ही क्यों न बदल डालें । जिन वस्तुओं से सुख-दुःख होते हैं उन्हें इकठ्ठा करने के बजाये, जिस मन को सुख-दुःख होते हैं उसे ही क्यों न बदल डालें - यह भारतीय दृष्टि निर्मित हुई । यह बहुत अनुभव से हुई ।
उन सब चीजों को इकठ्ठा कर लिया जिनसे सुख मिलता है, फिर भी पाया कि इकट्ठे होते ही उनसे सुख नहीं मिलता । जिनसे दुःख मिलता है उनको अलग करके भी देख लिया, उनके अलग हटने पर दुःख किसी और से मिलना शुरू हो जाता है - लेकिन समाप्त नहीं होता । अंततः पाया कि वस्तुओं से सुख-दुःख का कोई सीधा संबंध नहीं है । सुख और दुःख के लिए वस्तुएँ सिर्फ खूँटियों का काम करती हैं । हम घर आते हैं, खूँटी पर कोट टाँग देते हैं । अगर खूँटी न मिली तो दरवाजे पर टाँग देते हैं । दरवाजा न मिला तो खिड़की पर टाँग देते हैं । कोट कहीं न कहीं टंगता ही है, खूँटी से बहुत प्रयोजन नहीं है । इसलिए खूँटी तोड़ दो, या उसे बड़ी कर लो - कुछ फर्क नहीं पड़ता, कोट टंग ही जाता है ।
भारतीय मन ने जाना कि वस्तुएँ केवल खूँटियों का काम करती हैं और मन उन पर टंगता है, कोट की तरह । अब अगर मन में दुःख है तो हर खूँटी पर वह दुखी ही रहता है; मन लेकिन यदि सुख में है तो वह हर खूँटी पर सुखी ही रहता है । मन शांत है तो हर खूँटी पर वह शांत ही रहता है । मन लेकिन यदि अशांत है तो कोई भी खूँटी उसे शांत नहीं कर पाती है । इसलिए जरूरत खूँटियों को बदलने की नहीं है, मन को बदलने की है । इस तरह मन की खोज शुरू हुई - और मन की खोज में जो विश्लेषण हाथ लगा, उसमें पाया गया कि ओम जो है, वह मन का परमाणु है । क्या इस परमाणु का भी विस्फोट हो सकता है ? अगर हो सके, तो इस परमाणु से भी ऊर्जा पैदा होगी । क्या इस परमाणु का भी 'एक्सप्लोजन' हो सकता है ? योग कहता है कि हो सकता है । इसका अगर विसर्जन हो जाये, अगर यह टूट जाये तो भीतर ऊर्जा पैदा होगी । भीतर अग्नि पैदा होगी । वही अग्नि व्यक्ति के अहंकार को, उसके कर्मों को, उसके पापों को, उसके पुण्यों को, उसने जो भी किया है उस सबको, उसके अतीत को, उसके समस्त बोझ को, उसके समस्त भार को राख कर देगी ।
ओम का जो विस्फोट है - वह व्यक्ति के भीतर जो कुछ भी व्यर्थ है, सबको जला देता है । उसके बाद व्यक्ति वही नहीं रह जाता, जो वह था । संसार के तमाम बंधनों से वह मुक्त हो जाता है । वह दूसरा ही हो जाता है । उसका दूसरा ही जन्म होता है । दरअसल हमारे भीतर अस्तित्व ने वह कुँजी रख दी है, जिसका हम कभी भी उपयोग करें तो मुक्त हो सकते हैं । न उपयोग करें, तो यह हमारी ही जिम्मेवारी है ।

Wednesday, 9 April 2014

"धार्मिक व्यक्ति वह है, संन्यस्त वह है, सन्यासी वह है - जो कर्ता के भाव से नहीं जीता, साक्षी के भाव से जीता है" : ओशो


स्वयं की खोज अंततः उसकी खोज है, जिसके समक्ष सारे अनुभव घटित होते हैं । जिसके समक्ष सारी प्रतीतियाँ फलित होती हैं । जिसके समक्ष सारे दृश्य, सारे जगत का विस्तार प्रगट होता है ।
एक पत्थर है - वह है जरूर, लेकिन होने का उसे कोई अनुभव नहीं है । उसके होने में कोई कमी नहीं है, लेकिन होने की कोई चेतना उसके पास नहीं है । एक पशु है - वह भी है और उसे होने का बोध भी है । उसका अस्तित्व भी है और अस्तित्व का उसे अनुभव भी है । पत्थर का सिर्फ अस्तित्व है, अस्तित्व का कोई अनुभव नहीं है । पशु का अस्तित्व भी है, अस्तित्व का अनुभव भी है । मनुष्य में चेतना का एक तीसरा आयाम भी शुरू होता है । मनुष्य है, उसी तरह जैसे पत्थर है; मनुष्य को होने का अनुभव भी है, उसी तरह जैसे किसी पशु को है; और मनुष्य इन दोनों का भी साक्षी हो सकता है । मनुष्य यह भी जान सकता है कि मैं हूँ, मुझे होने का अनुभव हो रहा है और इन दोनों बातों को भी पीछे खड़े होकर अनुभव कर सकता है ।
यह जो तीसरे का अनुभव है, यह साक्षी है । पत्थर अचेतन है, पशु चेतन है, मनुष्य अपने चैतन्य के प्रति भी चेतन है । अपनी चेतना के प्रति भी जागा हुआ है । लेकिन, यह मनुष्य की संभावना है । सभी मनुष्य इस अवस्था में नहीं हैं । यह हो सकता है, यह है नहीं । साधारणतः अधिकतर मनुष्य पशु के स्तर पर ही होते हैं - जहाँ हैं और होने का पता है; लेकिन तीसरे तत्व का, साक्षी का कोई अनुभव नहीं है । और यह अवस्था भी सिर्फ जाग्रत में रहती है । निद्रा में तो हालत वही हो जाती है जो पत्थर की है । हैं, लेकिन होने का कोई पता नहीं ।
जब हम नींद में हैं तो हमारी और पत्थर की अवस्था में कोई भी फर्क नहीं है । जब हम गहरी प्रसुप्ति में पड़े हैं तो हम ठीक पत्थर जैसे हैं । और जब हमें साक्षी का कोई पता नहीं है, होने का ख्याल है बस, तो हम पशु की अवस्था में हैं । लेकिन वास्तविक मनुष्यता का जन्म हमारे भीतर 'विटनेसिंग', साक्षी के साथ शुरू होता है ।
साक्षी का अर्थ है, किसी चीज के साथ अलग हो जाना । अगर कोई व्यक्ति अपने समस्त अनुभवों से अलग हो जाए - वह अनुभव चाहे सुख के हों, या दुःख के; तो साक्षी का अनुभव शुरू होता है ।
साक्षी का अर्थ है कि कोई भी अनुभव तादात्म्य न बने । कोई भी अनुभव, मुझसे न जुड़े । जैसे रास्ते पर आप चल रहे हैं - ऐसे भी चल सकते हैं कि मैं चल रहा हूँ और ऐसे भी चल सकते हैं कि चलने की घटना घट रही है और मैं देख रहा हूँ । खाना खा रहे हैं - ऐसे भी खा सकते हैं कि मैं खा रहा हूँ और ऐसे भी खा सकते हैं कि खाना खाया जा रहा है, मैं देख रहा हूँ । हर घटना से तादात्म्य को छिन्न-भिन्न करना पड़े । हर घटना से तादात्म्य विसर्जित करना पड़े । वह चेतना जो सिर्फ देखती है, दृष्टा होती है । जानती है, ज्ञाता होती है । लेकिन भोक्ता नहीं होती ।
हमारा अनुभव तीन हिस्सों में विभाजित है - भोग, भोग्य और भोक्ता । भोग्य, जिसे हम भोगते हैं । भोजन हम कर रहे हैं, तो भोजन भोग्य है । हम कर रहे हैं, हम भोक्ता हैं । भोक्ता और भोग्य के बीच जो संबंध है, उसका नाम भोग है । भोग संबंध है । इसे ऐसे भी समझ सकते हैं : सूरज निकला है, हम देख रहे हैं । यहाँ सूरज दृश्य है, हम दृष्टा हैं, और दोनों के बीच का संबंध दर्शन है । पैर में कांटा गड़ गया है, पीड़ा हो रही है - यहाँ पीड़ा ज्ञेय है, हम ज्ञाता हैं, बीच का संबंध ज्ञान है । हर अनुभव तीन हिस्सों में टूटता है : विषय - जो बाहर है, जिसका हमें अनुभव हो रहा है । अनुभोक्ता, अस्मिता, अहंकार जो भीतर है, जिसको अनुभव हो रहा है । और दोनों के बीच का संबंध जो अनुभव बन रहा है ।
ये तीन समझ में आते हैं । इन तीनों के पार अगर आपके भीतर कोई चौथा भी है, तो उसका नाम साक्षी है । इन तीनों के पार अगर कोई चौथा भी हो जो इन तीनों को ऊपर से देख रहा हो - जो देख रहा हो कि भोजन किया जा रहा है, भोग लिया जा रहा है, भोक्ता भोग ले रहा है और भोक्ता व भोग के बीच में संबंध निर्धारित हो गया है भोग का; इन तीनों के पार भी अगर कोई खड़ा होकर देख सके आपके भीतर, तो उस चौथी संभावना का नाम साक्षी है ।
तीन स्थितियों को तो हम अनुभव करते हैं, चौथे को हम अनुभव नहीं करते हैं । उस चौथे को जगाना, उस चौथे को उठाना, उस चौथे को आधार देना, उस चौथे में प्रवेश करना, उसका ही साधन ध्यान है ।
जो भी आप कर रहे हों, खयाल रखें कि तीन तो ठीक हैं - चौथा भी कहीं है या नहीं ? और जैसे ही खयाल रखेंगे, चौथा जागना शुरू हो जायेगा । क्योंकि वह स्मरण से ही जागता है । उसे जगाने का और कोई उपाय नहीं है ।
साक्षी में 'मैं' का अतिक्रमण हो जाता है ।
इसलिए जिस दिन साक्षी का अनुभव शुरू होगा उस दिन 'मैं' का अनुभव समाप्त हो जायेगा । या इसे ऐसा समझे कि 'मैं' का अनुभव यदि समाप्त कर दें, तो साक्षी का अनुभव शुरू हो जायेगा । जब तक 'मैं' निर्मित होता है, तब तक जानना कि कर्ता का काम जारी है और साक्षी से अभी कोई संबंध नहीं हुआ है ।
 जीवन की प्रक्रिया का ठीक-ठीक बोध हो, तो पता चलेगा कि कर्ता हम हैं ही नहीं । फिर हम क्या हैं अगर कर्ता नहीं हैं ? अगर यह कर्ता का भाव छूट जाये तो फिर हम क्या हैं ? 
तब हमें पता चलेगा कि हम साक्षी हैं ।
एक बात और खयाल में लेनी चाहिए - जो लोग कर्ता भाव से जीते हैं, अगर वह धार्मिक भी हो जाएँ तो भी उनका कर्ता भाव नहीं जाता है । वह वहाँ भी कर्तापन लगाए रखते हैं । पहले वह कहते थे कि हमने महल बनाया, अब वह कहते हैं कि हमने आश्रम बनाया । पहले भोग भोगा, अब त्याग किया । यानि उनका करना जारी रहा ।
धार्मिक व्यक्ति वह है, संन्यस्त वह है, सन्यासी वह है - जो कर्ता के भाव से नहीं जीता; चाहे महल में रहता हो, चाहे झोपड़े में रहता हो । एक बात ही उसका गुण है कि वह कर्ता के भाव से नहीं जीता; वह साक्षी के भाव से जीता है ।

Saturday, 5 April 2014

जिस दिन खंडों के बीच अखंड की प्रतीति शुरू होती है, उसी दिन ब्रह्म की यात्रा पर हम निकलते हैं : ओशो


जीवन खंडों में विभाजित नहीं, अखंड है । खंडों में विभाजित दिखायी पड़ता है तो भी अखंड है । बहुत तरह के खंड दिखाई पड़ते हैं, लेकिन सभी खंड मूल आधार में संयुक्त हैं और इकट्ठे हैं । अन्यथा जगत के होने की संभावना ही नहीं है, अस्तित्व के होने की संभावना ही नहीं है । अस्तित्व बिखर जाए, अगर खंडों में हो । अस्तित्व बिखरता नहीं, क्योंकि खंडों में बँटा हुआ नहीं है, अखंड है ।
भौतिकविद के लिए अणु हैं, परमाणु हैं, इलेक्ट्रॉन हैं - और इन सब से मिलकर पदार्थ बना है । ठीक ऐसे ही चैतन्य के भी कण हैं, जीवकोश हैं - जिनसे मिल कर जीवन बना है । इस विराट जीवन को खंड-खंड में देखना ही विज्ञान है, इसको अखंड देख पाना धर्म है ।
वैज्ञानिक कहेगा कि जीवकोश रासायनिक पदार्थों का जोड़ है और व्यक्ति की आत्मा इन जीवकोशों का जोड़ है । धर्म इसकी ठीक विपरीत मान्यता है । धर्म कहता है, खंड का जोड़ नहीं है अखंड । खंड अखंड का भाव है । अखंड खंडों का जोड़ नहीं है । खंड अखंड का भाग है । खंडों के जोड़ से अखंड नहीं बनता, अखंड अपनी हैसियत से है । वह कोई गणितीय जोड़ नहीं है, सावयव एकता है । अखंड अपनी हैसियत से है, खंडों को उसका पता नहीं है । क्योंकि खंड को अखंड का पता इसलिए नहीं होता कि खंड अपने भीतर ही बंधकर जीता है । उसे पता नहीं है । जब खंड अपने से बाहर निकलता है, अपने से ऊपर उठता है, जागकर अपने से पार देखता है, तब उसे अखंड की प्रतीति शुरू होती है ।
इसे ऐसे समझें कि माँ के पेट में एक बच्चा है गर्भ में, उसे इस जगत का कोई पता नहीं है । क्यों पता नहीं है ? क्योंकि माँ के पेट में जो बच्चा है, वह अपनी ही हैसियत से एक इकाई है । और उसका जगत से कोई सीधा संबंध नहीं है । उसे पता भी नहीं है कि सूरज निकलता है, चाँद-तारे हैं; उसे पता भी नहीं है कि लोग हैं, विराट जगत है, उसे कुछ भी पता नहीं है । और गर्भ के भीतर बच्चा इतना सुनिश्चित इकाई में बँधा हुआ है कि वह अपने को ही जगत मान ले तो कोई आश्चर्य नहीं है । क्योंकि न उसे खाने के लिए आयोजन करना पड़ता है, न उसे पीने के लिए आयोजन करना पड़ता है, न उसे आत्मरक्षा के लिए आयोजन करना पड़ता है - उसे कुछ करना ही नहीं पड़ता है, वह सिर्फ होता है । और परिपूर्ण होता है । उसको कहीं कोई कमी नहीं होती । उसे खयाल भी नहीं आ सकता कि मुझसे अलग भी कुछ है । लेकिन गर्भ के बाहर आएगा, अपनी सीमाओं को तोड़ेगा तो जगत का प्रारंभ होगा ।
इसलिए वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे का जन्म जो है, बहुत 'ट्रामेटिक' है, उसे बड़ा धक्का लगता है । एकदम एक सीमा में बँधा हुआ अस्तित्व था, एकदम से टूट जाता है और एक असीम जगत में खड़ा हो जाता है जहाँ कुछ भी सूझता नहीं है । पहली बार पता चलता है, मैं ही नहीं हूँ और भी बहुत कुछ है । मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह धक्का इतना गहरा है कि जिंदगी भर इस धक्के से आदमी संभल नहीं पाता है । और मनोवैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं - इसमें सच्चाई भी दिखती है - कि आदमी जो शांति की खोज करता है, आनंद की खोज करता है, स्वतंत्रता की खोज करता है, आत्मा की खोज करता है, परमात्मा की खोज करता है, यह अपने गर्भ के अनुभव के कारण करता है । क्योंकि गर्भ में वह परम स्वतंत्र था, परम आनंदित था, परम शांत था, कोई तनाव न था, कोई सीमा न थी, जीवन पूरा का पूरा उपलब्ध था, उसमें कहीं कोई बाधा न थी; कोई जिम्मेवारी न थी, कोई बोझ न था, कोई चिंता न थी ।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह जो मोक्ष की खोज है, उस गर्भ में अनुभव हुई शांति के ही कारण है । क्योंकि वह गहरा अनुभव है और फिर उसके बाद जगत का गहरा धक्का है ।
मोक्ष की जो हमारी धारणा है, वह विराट गर्भ की है । उसे हमने हिरण्यमय गर्भ कहा भी है - 'द वूंब ऑफ द डिवाइन' । वह जो परमात्मा का गर्भ है, उसमें मैं ऐसे लीन हो जाऊँ जैसे माँ के गर्भ में था । न कोई चिंता, न कोई पीड़ा, न पराये का पता । लेकिन बच्चा बाहर आता है तो उसे जगत दिखाई पड़ता है ।
बीज टूटता है, अंकुरित होता है तो उसे सूरज के दर्शन होते हैं । जहाँ तक हमारी स्थिति है, जैसे हम हैं, अभी हम अहंकार की खोल में बंद हैं । उसके पार हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता । मैं-ही-मैं दिखायी पड़ता हूँ । अगर कभी थोड़ी बहुत झलक किसी की मिलती भी है तो वह भी 'मेरे' होने के कारण मिलती है । 'मेरा' मित्र है, 'मेरा' भाई है, 'मेरी' पत्नी है, 'मेरा' पति है । तो 'मेरे' से कहीं थोड़ा-सा संबंध जुड़ता है तो थोड़ी-सी झलक मुझे मिलती है । बस यही मेरा जगत है । इसके पार जो विराट फैला हुआ है, उसका मुझे कोई पता नहीं है । धर्म एक पुनर्जन्म है, एक 'रिबर्थ' । एक और गर्भ को तोड़ना है । यह अहंकार को भी तोड़ देना है । लेकिन यह अहंकार तभी टूटे, जब मेरे खंडों का जो जोड़ है उसके पार मुझमें कोई अंकुरण शुरू हो जाए । कुछ भिन्न मेरे भीतर जागने लगे, मेरे जोड़ से ज्यादा । जिस दिन खंडों के बीच अखंड की प्रतीति शुरू होती है, उसी दिन ब्रह्म की यात्रा पर हम निकलते हैं ।

Thursday, 29 August 2013

जो कहे मैं जानता हूँ, जान लेना कि वह कुछ नहीं जानता


ओशो के अनुसार दुनिया में ज्ञानी कोई नहीं है, सभी अज्ञानी हैं ।
अज्ञानी, उनका कहना रहा कि दो तरह के होते हैं - एक, जिनको पता है और दूसरे वे जिनको यह नहीं पता है । ओशो ने कहा कि जिनको अपने अज्ञान का पता है, उन्हीं को ज्ञानी कहा जाता है; और जिनको अपने अज्ञान का पता नहीं, उन्हें अज्ञानी कहा जाता है । बाकी हैं दोनों ही अज्ञानी !
सुकरात ने कहा है कि जब मैंने जान लिया कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ, उसी दिन प्रकाश हो गया ।
उपनिषद कहते हैं कि जो कहे मैं जानता हूँ, जान लेना कि वह कुछ नहीं जानता; जो कहे कि मुझे कुछ पता नहीं, उसका पीछा करना - हो सकता है कि उसे कुछ पता हो ।
इसीलिए कहा गया है कि ज़िंदगी बड़ी पहेली है ।

Thursday, 12 January 2012

तुम कुछ नहीं कर रहे हो, तुम सिर्फ भ्रान्ति ढो रहे हो

व्यक्तियों की कथा को ओशो ने एक पत्थर की 'हरकत' के जरिये दिलचस्प रूप में कहा है : एक महल के पास पत्थरों का एक ढेर लगा था | एक छोटा बच्चा वहाँ से निकला और उसने एक पत्थर उठा कर महल की खिड़की की तरफ फेंका | आकांक्षा तो सभी पत्थरों में होती है कि काश उन्हें पंख लग जाएँ और वह आकाश में उड़ें | इस पत्थर ने भी आकाश में उड़ने के सपने देखे थे | आज जब उसने अपने को उड़ता हुआ पाया तो अपने साथियों से गर्व से बोला कि मित्रों, मैं आकाश की सैर को जा रहा हूँ | यह कहते हुए उसने अपने आप को विशिष्ट, असाधारण, अद्धितीय, महान, सौभाग्यशाली माना | दूसरे पत्थरों को उसे उड़ता हुआ देख कर ईर्ष्या तो हो रही थी, जलन तो हो रही थी - लेकिन चूँकि वह उसका उड़ना प्रत्यक्ष देख रहे थे इसलिए उन्हें भी यही लगा कि वह विशिष्ट, असाधारण, अद्धितीय, महान, सौभाग्यशाली है |
पत्थर फेंका गया था | लेकिन उस पत्थर ने और दूसरे पत्थरों ने भी यही सोचा/समझा कि वह उड़ रहा है |
महल की खिड़की की तरफ फेंका गया पत्थर खिड़की के काँच से टकराया और काँच चकनाचूर हो गया | पत्थर ने अकड़ के साथ कहा कि हज़ार बार कहा है कि मेरे मार्ग में कोई न आये | आएगा तो चकनाचूर हो जाएगा | अब भुगतो |
पत्थर ने अपनी अकड़ के चलते इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया कि उसने काँच को चकनाचूर नहीं किया है | यह तो पत्थर और काँच को जो स्वभाव मिला है - जिसके चलते जब भी वह दोनों टकरायेंगे, काँच ही चकनाचूर होगा - उसका स्वाभाविक नतीज़ा है | क्या यह पत्थर के बस में था कि वह काँच से टकराता और काँच को न तोड़ता ?  क्या पत्थर यह तय कर सकता है कि काँच से टकराने के बाद वह चाहे तो काँच टूटे और चाहे तो न टूटे | ज़ाहिर है कि जो हुआ वह हो रहा था - वह किया नहीं जा रहा था |
पत्थर लेकिन इसी बात पर अकड़ा हुआ था कि जो हुआ है, वह उसी ने किया है |
काँच से टकराने के कारण पत्थर की गति भी टूट गई थी | बच्चे के हाथ से फेंके जाने के कारण उसे जो बल मिला था, वह काँच से टकराने से मिले प्रतिरोध के कारण खत्म हो गया था | इसका नतीज़ा यह हुआ कि पत्थर खिड़की के पार महल में बिछे कालीन पर गिर गया |
पत्थर गिरा था, लेकिन उसकी अकड़ ढीली नहीं पड़ी थी | उसने कहा कि वह चूँकि थक गया है इसलिए आराम करने के लिए यहाँ लेट गया है | चारों तरफ का नज़ारा देख कर तो वह और भी प्रफुल्लित हुआ - उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसके आने की खबर यहाँ पहले ही पहुँच गई थी और यहाँ के लोगों ने उसके स्वागत की तैयारियाँ भी कर रखी थीं : कालीन बिछा दिए गए थे, चित्र सजा दिए गए थे, फानूस लटका दिए गए थे, रोशनी का पूरा इंतजाम कर दिया गया था | यह देख कर पत्थर ने अपने आप को अतिथि समझा और अपनी इस सोच को और पुख्ता किया कि वह कोई साधारण पत्थर नहीं है |
इस बीच काँच के टूटने की आवाज से नौकर भागता हुआ अंदर आया और उसने पत्थर को देखा तो उसे वहाँ से हटाने/फेंकने के लिए उसे हाथ में उठा लिया | पत्थर ने अपनी किस्मत पर फिर गर्व किया | उसने कहा कि राजा ने उसे बुलवा भेजा है | अपने खास नौकर को उसे लेने भेजा है |
राजा को पत्थर का कुछ पता भी न था | काँच के टूटने की उसने कोई आवाज भी न सुनी होगी | नौकर ने भी पत्थर को फेंकने के लिए ही हाथ में उठाया था | पर पत्थर झूठे ही कहानियाँ बना रहा था | नौकर ने पत्थर को वापस फेंक भी दिया था | पत्थर ने लेकिन इतराना फिर भी नहीं छोड़ा | उसने अब यह कहना शुरू किया कि उसे अपने प्रियजनों की याद आ रही थी इसलिए उसने राजा के पास जाने से इंकार कर दिया और अपने घर अपने लोगों के बीच वापस लौट आया है | उसने कहा कि अपना घर अपना होता है; पराये महलों में रुकने में वह आराम कहाँ जो अपने झोपड़े में मिलता है |
यह किस्सा सुना कर ओशो ने कहा कि सभी व्यक्तियों की यही कहानी है | जो होता है, उसे कहते हैं कि उन्होंने किया है | करने की बात को उन्होंने भ्रान्ति  कहा है | उन्होंने कहा कि तुम कुछ कर नहीं सकते, तुम सिर्फ हो सकते हो | तुम सोचते हो कि तुम कर रहे हो - तुम करते हुए नज़र भी आ रहे हो, लेकिन सच यह है कि तब भी तुम नहीं कर रहे | तुम सिर्फ भ्रान्ति ढो रहे होते हो |                   

Tuesday, 3 January 2012

प्रेम से जो भक्ति उठती है, वह तो रोज नई-नई ही होगी

ओशो ने अपने एक प्रवचन में रामकृष्ण के जीवन के एक उल्लेख का बहुत ही मार्मिक विवरण प्रस्तुत किया है : रानी रासमणी, जो कि जाति से शूद्र थी, ने एक मंदिर बनवाया | चूँकि वह शूद्र थी, इसलिए उसके मंदिर में कोई ब्राह्मण पूजा करने को राजी न हुआ | हालाँकि रासमणी खुद भी कभी मंदिर में अंदर नहीं गई थी, कि कहीं मंदिर अपवित्र न हो जाए | वह शूद्र थी, इसलिए वह खुद पूजा नहीं कर सकती थी | यह सोच-सोच कर वह बड़ी दुखी थी, बड़ी पीड़ित थी कि मंदिर क्या बिना पूजा के रह जाएगा ? इसी बीच किसी ने उसे खबर दी कि गदाधर नाम का एक ब्राह्मण लड़का है, शायद वह यहाँ पूजा करने को राजी हो जाए | रासमणी को बता भी दिया गया कि गदाधर थोड़ा अलग तरह का लड़का है |
यह गदाधर ही बाद में रामकृष्ण बना |
रासमणी ने गदाधर से पूछा, गदाधर पूजा करने के लिए तैयार हो गया | उसने एक बार भी यह हिचक नहीं दिखाई कि ब्राह्मण होकर मैं शूद्र के मंदिर में कैसे जाऊँ ? उसने यही कहा कि प्रार्थना अभी यहाँ करते हैं, अब वहाँ करेंगे | घर के लोगों ने और परिचितों ने उसे बहुत रोका तथा समझाया कि वह उसे कहीं और नौकरी दिला देंगे, नौकरी के लिए अपने धर्म को क्यों खो रहा है ? गदाधर ने लेकिन एक ही बात कह कर उन्हें चुप करा दिया कि सवाल नौकरी का नहीं है; भगवान बिना पूजा के रह जाएँ, यह बात जँचती नहीं है इसलिए वहाँ पूजा करेंगे |
गदाधर ने पूजा करने के लिए अपनी सहमति दे दी थी, और रासमणी खुश थी | पर रासमणी को साथ ही यह भी बता दिया गया था कि गदाधर पूजा करने को तैयार तो हो गया है, लेकिन पूजा में यह दीक्षित नहीं है | इसने कभी किसी मंदिर में पूजा नहीं की है, यह घर पर ही पूजा करता रहा है | इसकी पूजा का कोई शास्त्रीय ढंग या विधि-विधान नहीं है | और इसकी पूजा भी जरा अनूठी है | कभी करता है, कभी नहीं भी करता है | कभी दिन भर करता है, कभी महीनों भूल जाता है | और इससे भी गड़बड़ बात यह कि यह पूजा करते वक्त पहले खुद अपने को भोग लगा लेता है, फिर भगवान को लगाता है |
रासमणी के पास लेकिन कोई विकल्प नहीं था, सो उसने इन सब बातों पर ध्यान नहीं दिया | उसने यही कहा कि जब यहाँ और कोई पूजा करने आने को तैयार नहीं है तो जो आने के लिए राजी है, उसे आने दो | कुछ तो यहाँ हो |
गदाधर आया | अपने साथ गड़बड़ें भी लाया | मंदिर में कभी पूजा होती, तो कभी मंदिर के द्धार भी नहीं खुलते | कभी दिन बीत जाते और घंटा भी न बजता, दिया भी न जलता | कभी ऐसा होता कि सुबह से प्रार्थना चलती तो शाम तक नाचते ही रहते रामकृष्ण |
रासमणी को भी चिंता हुई कि यह सब क्या है ? उन्होंने रामकृष्ण से पूछा कि यह किस तरह की पूजा है ? किस शास्त्र में लिखी है यह ?
रामकृष्ण ने कहा कि शास्त्र से पूजा का क्या संबंध है ? पूजा तो प्रेम की है | जब करने का मन ही न हो, तो करना गलत होगा | और फिर भगवान तो जान ही लेगा कि यह जो पूजा हो रही है, यह बे-मन से हो रही है, यह झूठे ही हो रही है | रामकृष्ण ने रासमणी को बता दिया कि पूजा मैं तुम्हारे लिए नहीं कर रहा हूँ, पूजा तो मैं परमात्मा के लिए कर रहा हूँ; और परमात्मा को मैं धोखा नहीं दे सकता | यह पूजा न करने से भी बड़ा पाप होगा |
विधि-विधान की बात हुई तो रामकृष्ण ने कहा कि परमात्मा जैसा करवाता है, हम वैसा करते हैं | हम अपना बनाया विधि-विधान उस पर नहीं थोपते | यह कोई क्रिया कांड नहीं है, पूजा है | यह प्रेम है | रोज जैसी भाव-दशा होती है, वैसा होता है | कभी पहले फूल चढ़ाते हैं, कभी पहले आरती करते हैं | कभी नाचते हैं, कभी शांत बैठते हैं | कभी घंटा बजाते हैं, कभी नहीं भी बजाते | जैसा आर्विभाव होता है भीतर, जैसा वह करवाता है, वैसा करते हैं | हम कोई करने वाले नहीं |
रासमणी ने कहा कि चलो यह सब छोड़ो | पर यह तो बहुत ही पाप की बात है कि तुम पहले खुद चख लेते हो, फिर भगवान को भोग लगाते हो | कहीं दुनिया में ऐसा नहीं सुना | पहले भगवान को भोग लगाओ, फिर प्रसाद ग्रहण करो | तुम भोग खुद को लगाते हो, प्रसाद भगवान को देते हो |
रामकृष्ण ने कहा कि यह तो मैं कभी न कर सकूँगा | जैसा मैं करता हूँ, वैसा ही करूँगा | मेरी माँ भी जब कुछ बनाती थी तो पहले खुद चख लेती थी, फिर मुझे देती थी | पता नहीं, देने योग्य है भी या नहीं | जो मेरी माँ न कर सकी मेरे साथ, वह मैं भगवान के साथ कैसे कर सकता हूँ ? कभी मिठाई में शक्कर ज्यादा होती है, वह जब मुझे ही नहीं अच्छी लगती, तो मैं उसे भगवान को कैसे दे सकता हूँ ? कभी शक्कर होती ही नहीं, बिना शक्कर वाली मिठाई जब मैं ही नहीं खा सकता तो उसे भगवान को कैसे चढ़ा दूँ | यह पाप नहीं होगा क्या ?
इस प्रसंग से यही संदेश निकलता है कि प्रेम से जो भक्ति उठती है, वह तो रोज नई-नई ही होगी | उसका कोई क्रिया कांड नहीं होगा | नहीं हो सकता है | उसका कोई बंधा हुआ ढाँचा नहीं हो सकता है | प्रेम भी कहीं ढांचे में हुआ है ? पूजा का भी कहीं कोई शास्त्र है ? प्रार्थना की भी कोई विधि है ? वह तो भाव का सहज आवेदन है | भाव की तरंग है |